पैग़म्बर-ए-इस्लाम मुहम्मद ﷺ : अमर सीरत और इंसानियत के लिए एक मुकम्मल नमूना

रबि उल अव्वल, 1448 हिजरी

﷽
   फरमाने रसूल      ﷺ

कोई बंदा उस वक्त तक मोमिन नहीं हो सकता, जब तक अच्छी और बुरी तकदीर पर इमान ना लाए, यहाँ तक कि वो जान ले कि जो चीज़ उसे मिलने वाली थी, उसे ही मिली, किसी के पास नहीं जा सकती, जो चीज़ उसे नहीं मिलनी थी, वह किसी सूरत उसे नहीं मिलनी है।

-  जामाह तिर्मिज़ी


profet muhammad (s.a.w.), hajrat muhammad (s.a.w.)


   आप ﷺ की सीरत पर दुनिया के नामवर इतिहासकारों ने भी चलाई है कलम   

1.  Michael H. Hart — The 100

2.  William Montgomery Watt — Muhammad at Mecca

3.  William Montgomery Watt — Muhammad at Medina

4.  Martin Lings — Muhammad: His Life Based on the Earliest Sources

5.  Karen Armstrong — Muhammad: A Prophet for Our Time

6.  John Davenport — An Apology for Mohammed and the Koran

7.  Thomas Carlyle — On Heroes

8.  R. V. C. Bodley — The Messenger

9.  Bosworth Smith — Mohammed and Mohammedanism

10. Philip K. Hitti — History of the Arabs


नुज़हत सुहेल पाशा : रायपुर

➧ ➧ मज़हब-ए-इस्लाम की रोशन तारीख, सकाफत और उर्दू अदब से वाबस्तगी के लिए पढ़ते रहें ‘’ बख़्तावर अदब …’’ 

    इस्लाम का पैग़ाम कोई नया नहीं, यह उस वक़्त से मौजूद है, जबसे इस कायनात की तख़्लीक़ हुई। हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, जो इंसानियत के पहले फ़र्द और पहले पैग़म्बर थे, से लेकर हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिमुस्सलाम तक तमाम अंबिया और रसूलों ने एक ही बुनियादी हक़ीक़त की तरफ़ इंसानों को बुलाया, एक अल्लाह की इबादत और इंसानियत की ख़िदमत।

    पैग़म्बर मुहम्मद  ﷺ इसी मुक़द्दस सिलसिले की आख़िरी कड़ी हैं। आप ﷺ ने न सिर्फ़ उसी पैग़ाम को पूरी वज़ाहत के साथ पेश किया, बल्कि उसे अपनी ज़िंदगी में अमली नमूने की शक्ल में पेश करके तकमील तक पहुँचा भी दिया।

    पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सीरत दुनिया की तारीख़ में सबसे ज़्यादा पढ़ी और समझी जाने वाली सीरतों में से एक है। आम तौर पर दुनिया की बड़ी-बड़ी शख़्सियतों की ज़िंदगी पर लिखी गई किताबों की मक़बूलियत एक ख़ास दौर तक रहती है। मगर मुहम्मद ﷺ की सीरत की यह ख़ूबी है कि चौदह सदियों का लंबा सफ़र तय करने के बावजूद आज भी वह उसी दिलचस्पी, अकीदत और मोहब्बत के साथ पढ़ी जाती है।

    आप ﷺ की सीरत पर दुनिया की मुख़्तलिफ़ ज़बानों में बेशुमार किताबें लिखी गई हैं। दुनिया की लगभग तमाम बड़ी ज़बानों में आप ﷺ ज़िंदगी, आप ﷺ तालीमात और आप ﷺ के किरदार पर साहित्य मौजूद है। मशहूर किताब द हंड्रेड" में माइकल एच. हार्ट ने दुनिया की सबसे असरअंगेज़ शख़्सियतों की फ़ेहरिस्त में पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ को पहला मक़ाम दिया है।

    यह महज़ एक फ़ेहरिस्त में दिया गया मक़ाम नहीं, बल्कि इस बात की एक अहम मिसाल है कि मुहम्मद ﷺ की शख़्सियत का असर मज़हबी हदूद से निकलकर इंसानी तारीख़ के एक वसीअ दायरे तक पहुँचता है।

    मुहम्मद ﷺ का किरदार सच्चाई, रहमत, दरगुज़र, मुसावात और इंसाफ़ का ऐसा हसीन इम्तिज़ाज है, जिसकी मिसाल तारीख़ में बहुत कम मिलती है। आप ﷺ की तालीम ने इंसान की क़ीमत का पैमाना नस्ल, रंग, क़ौम, दौलत या सामाजिक हैसियत को नहीं, बल्कि तक़वा, नेक किरदारी और अच्छे अख़लाक़ को क़रार दिया है।

    यही वजह है कि चौदह सौ साल से ज़्यादा का अरसा गुज़र जाने के बावजूद आप ﷺ की सीरत आज भी लाखों-करोड़ों दिलों में ज़िंदा है जो सिर्फ़ पढ़ी नहीं जाती, बल्कि दुनिया के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में करोड़ों इंसानों की ज़िंदगी का हिस्सा बनी हुई है। यही किसी अमर किरदार की सबसे बड़ी पहचान है।

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पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ : पूरी इंसानियत के लिए रहमत

    अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी रसूल, हज़रत मुहम्मद ﷺ को सिर्फ़ एक क़ौम या एक ज़माने के लिए नहीं, बल्कि तमाम आलम के लिए रहमत बनाकर भेजा है।

क़ुरआन-ए-करीम में इरशाद है:

'' और हमने आपको तमाम जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजा है। '' (सूरह अल-अंबिया, 107)

    यह आयत पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की रिसालत के उस पहलू को सामने लाती है, जिसमें आप ﷺ की शख़्सियत इंसानियत के लिए रहमत, हिदायत और ख़ैरख़्वाही का मरकज़ बनकर सामने आती है।

    आप ﷺ की पूरी ज़िंदगी इंसाफ़, रहमत, मुसावात और इंसानों की ख़िदमत का एक रौशन नमूना है। आप ﷺ ने सिर्फ़ अच्छी बातें कहने पर इकतिफ़ा नहीं किया, बल्कि अपनी ज़िंदगी के हर गोशे में उन तालीमात को अमली शक्ल देकर दिखाया भी है।

इंसाफ़ और मुसावात

    पैग़म्बर ﷺ के यहाँ इंसाफ़ किसी रिश्ते, नस्ल, क़ौम या मज़हब का पाबंद नहीं था। हक़ जहाँ होता, आप ﷺ का फ़ैसला वहीं होता। एक मौक़े पर चोरी के एक मामले में जब एक रसूख़दार ख़ानदान की औरत के लिए सज़ा रोकने की सिफ़ारिश की गई तो आप ﷺ ने साफ़ फ़रमाया:

" अल्लाह की क़सम! अगर फ़ातिमा बिन्त मुहम्मद भी चोरी करतीं तो मैं उनका हाथ काट देता।(सहीह बुख़ारी) "

    यह फ़रमान उसूल-ए-इंसाफ़ की वह बुलंद मिसाल है, जिसमें क़ानून की नज़र में किसी के लिए कोई खास रियायत नहीं। इस्लाम का यह तसव्वुर-ए-इंसाफ़, इंसान को यह सिखाता है कि रिश्ते और रसूख़ इंसाफ़ से ऊपर नहीं हो सकते।

रहमत और दरगुज़र

    पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सीरत का सबसे रौशन पहलू आप ﷺ की रहमत और दरगुज़र है। ताइफ़ के सफ़र में आप ﷺ को सख़्त तकलीफ़ का सामना करना पड़ा। उस वक़्त जब बदला लेने की गुंजाइश मौजूद थी और सज़ा देने का विकल्प सामने था, आप ﷺ ने इंतिक़ाम का रास्ता इख़्तियार नहीं किया। आप ﷺ की निगाह आने वाली नस्लों पर थी और दिल में उनके लिए भी हिदायत की उम्मीद मौजूद थी।

    यह वाक़िया इस बात की गवाही देता है कि आप ﷺ की रहमत महज़ दोस्तों और मानने वालों तक महदूद नहीं थी। आप ﷺ की ख़ैरख़्वाही में वह इंसान भी शामिल था, जिसने आप ﷺ को तकलीफ़ पहुँचाई थी। यही दरगुज़र और रहमत आप ﷺ की सीरत को इंसानी तारीख़ में एक अलग और बुलंद मक़ाम अता करती है।

    ब्रिटिश इतिहासकार, पुरातत्वविद और ओरिएंटलिस्ट स्टेनली लेन पूल ने अपनी किताब The Speeches & Table-Talk of the Prophet Mohammad (1882) में फतहे मक्का के वक्त आम मुआफी को तारीख की महान घटनाओं में शुमार किया है। 

मुसावात और भाईचारा

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    पैग़म्बर ﷺ ने इंसानों के बीच नस्ली और सामाजिक फ़र्क़ को फ़ज़ीलत का पैमाना मानने से इनकार किया। हज के मौक़े पर अपने मशहूर आख़िरी ख़ुत्बे में आप ﷺ ने इंसानी बराबरी का एक ऐसा उसूल बयान किया जो आज भी पूरी दुनिया के लिए रहनुमाई का सामान रखता है।

" किसी अरब को अजमी पर और किसी गोरे को किसी काले पर कोई फ़ज़ीलत नहीं, सिवाय तक़वा के। "

    यह पैग़ाम उस दौर में दिया गया, जब नस्ल, क़बीला और सामाजिक हैसियत इंसान की क़ीमत तय करने के अहम पैमाने थे। आप ﷺ ने इंसान को उसकी नस्ल और रंग से नहीं, बल्कि उसके किरदार और तक़वा से पहचान दी।

इंसानियत की ख़िदमत

    पैग़म्बर ﷺ ने समाज के कमज़ोर तबक़ात की तरफ़ ख़ास तवज्जो दिलाई। यतीम, मिस्कीन, बेवा, ग़रीब और ज़रूरतमंद आप ﷺ की तालीमात के अहम मौज़ू रहे।

आप ﷺ ने फ़रमाया:  " सबसे बेहतर इंसान वह है, जो लोगों के लिए सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद हो। (मुस्नद अहमद) "

यह तालीम इंसानियत की ख़िदमत को महज़ सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि इंसानी फ़ज़ीलत का एक बुलंद दर्जा बनाती है। आप ﷺ की सीरत में इबादत और इंसानी ख़िदमत एक-दूसरे से जुदा नहीं। अल्लाह से ताल्लुक़ इंसानों के साथ हुस्न-ए-सुलूक और ख़ैरख़्वाही में भी ज़ाहिर होना चाहिए।

पड़ोसी का हक़

    पैग़म्बर ﷺ ने पड़ोसी के हक़ को इतनी अहमियत दी कि उसे ईमान और अच्छे किरदार का हिस्सा बना दिया।

आप ﷺ ने फ़रमाया : " जिब्रील मुझे लगातार पड़ोसी के हक़ के बारे में वसीयत करते रहे, यहाँ तक कि मुझे ख़याल हुआ कि वह उसे वारिस बना देंगे। (बुख़ारी, मुस्लिम) "

    आप ﷺ ने पड़ोसी के भूखे रहने और ख़ुद पेट भरकर खाने को भी एक मोमिन के किरदार के लिए गंभीर चेतावनी क़रार दिया।

एक और हदीस में फ़रमाया : " अल्लाह की क़सम! वह मोमिन नहीं, जिसका पड़ोसी उसकी तकलीफ़ से महफ़ूज़ न हो। (सहीह बुख़ारी) "

    गोया एक बेहतर समाज की बुनियाद सिर्फ़ बड़े-बड़े क़ानूनों पर नहीं, बल्कि पड़ोसी के हक़, दूसरे इंसान की तकलीफ़ और अपने आस-पास रहने वालों की ज़रूरत का एहसास करने पर भी क़ायम होती है।

औरत की इज़्ज़त और गरिमा

    पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने औरत की इज़्ज़त, हक़ और गरिमा पर ख़ास ज़ोर दिया है। अपने आख़िरी ख़ुत्बे में आप ﷺ ने औरतों के बारे में अल्लाह से डरने और उनके हक़ अदा करने की ताकीद फ़रमाई:

" औरतों के बारे में अल्लाह से डरो, क्योंकि तुमने उन्हें अल्लाह की अमानत के तौर पर हासिल किया है। (मुस्लिम) "

    आप ﷺ ने अपने घरवालों के साथ अच्छे बर्ताव को भी इंसान की फ़ज़ीलत का पैमाना क़रार दिया:

" तुममें सबसे बेहतर वह है, जो अपने घरवालों के लिए सबसे बेहतर हो, और मैं तुममें अपने घरवालों के लिए सबसे बेहतर हूँ। (तिर्मिज़ी) "

    यह तालीम इस बात को वाज़ेह करती है कि किसी इंसान के अच्छे किरदार का असल इम्तिहान उसके घर और उसके क़रीबी रिश्तों में होता है।

ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़

    पैग़म्बर ﷺ ने ज़ुल्म को सख़्ती से मना किया और इंसाफ़ को इंसानी समाज की बुनियादी ज़रूरत क़रार दिया।

आप ﷺ ने फ़रमाया : " ज़ुल्म से बचो, क्योंकि ज़ुल्म क़यामत के दिन अंधेरों का सबब होगा। (मुस्लिम) "

और मज़लूम के बारे में फ़रमाया : " मज़लूम की बददुआ से बचो, क्योंकि उसके और अल्लाह के बीच कोई पर्दा नहीं। (बुख़ारी, मुस्लिम) "

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    अपने आख़िरी ख़ुत्बे में आप ﷺ ने इंसानी जान, माल और इज़्ज़त की हुरमत का ऐलान करते हुए फ़रमाया : " ऐ लोगो! तुम्हारा ख़ून, तुम्हारा माल और तुम्हारी इज़्ज़त एक-दूसरे पर उसी तरह मुक़द्दस है, जैसे इस दिन की, इस महीने की और इस शहर की हुरमत है। (बुख़ारी, मुस्लिम) "

    यह ऐलान इंसानी जान और इज़्ज़त की हुरमत को एक ऐसा उसूल बना देता है, जिसकी अहमियत किसी दौर और किसी सरहद की मोहताज नहीं।

एक ऐसा किरदार जो वक़्त से आगे है

पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सीरत का मुताला किया जाए तो सामने एक ऐसी मुकम्मल इंसानी तस्वीर उभरती है, जिसमें रहमत भी है और इंसाफ़ भी, इबादत भी है और इंसानियत की ख़िदमत भी, सख़्ती के मौक़े पर उसूल की पाबंदी भी है और बदला लेने की क़ुदरत के बावजूद दरगुज़र भी।

आप ﷺ ने इंसान को इंसान की इज़्ज़त करना सिखाया। यतीम के सिर पर शफ़क़त का हाथ रखा, ग़रीब और मिस्कीन के हक़ की याद दिलाई, पड़ोसी के हक़ को अहमियत दी, औरत की इज़्ज़त की हिफ़ाज़त की, मज़लूम के साथ खड़े होने की तालीम दी और ज़ुल्म को हर शक्ल में नापसंद किया। यही वजह है कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सीरत सिर्फ़ मुसलमानों के लिए धार्मिक अकीदत का मौज़ू नहीं, बल्कि इंसानी किरदार, अख़लाक़ और समाजी ज़िंदगी के लिए भी एक गहरी रहनुमाई पेश करती है।

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    चौदह सदियाँ गुज़र गईं, दुनिया बदल गई, इंसानी समाज के तौर-तरीक़े बदल गए, विज्ञान और टेक्नोलॉजी ने इंसानी ज़िंदगी का नक़्शा बदल दिया लेकिन सच्चाई, इंसाफ़, रहमत, मुसावात और इंसानी गरिमा की क़ीमत आज भी वही है। इसीलिए पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सीरत आज भी पढ़ी जाती है, समझी जाती है और उससे रहनुमाई हासिल की जाती है।

मुहम्मद ﷺ की सीरत का उजाला सदियों के सफ़र के बाद भी कम नहीं हुआ। क्योंकि यह सिर्फ़ एक शख़्स की तारीख़ नहीं, यह इंसान को इंसानियत का मतलब समझाने वाली एक अमर दास्तान है। और शायद यही वजह है कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सीरत आने वाली नस्लों के लिए भी उसी तरह रहनुमाई का स्रोत बनी रहेगी, जैसे वह पिछली चौदह सदियों से बनी हुई है।

Media incharge 

Women's wing, chhatisgarh

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