मकामे इब्राहिम, महज पत्थर नहीं, खुली निशानी है

 जिल हज्ज, 1447 हिजरी 

फरमाने रसूल   ﷺ

अल्लाह ताअला ने मेरी उम्मत के दिलों में पैदा होने वाले वसवसों को माफ कर दिया है, जब तक वो उस पर अमल न करे या ज़बान पर ना लाए।

- सहीह बुख़ारी 


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✅ मक्का मुकर्रमा ज़ाकि़र घुरसेना

    इस्लामिक तारीख की सबसे खूबसूरत और अहम मोजजों में से एक है। यह महज पत्थर नहीं, अल्लाह की तरफ से दी गई एक खुली निशानी (आयत) है, जो पैगंबर इब्राहिम (अलैहेमुस्सलाम) के अल्लाह के तंई झुकाव, रगबत और मोहब्बत को बयां करती है।

क्या है तारीख

जब काअबा शरीफ की ताअमीर का हुक्म आया अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम को ज़मीन पर अल्लाह का घर यानि काअबा शरीफ की ताअमीर का दोबारा हुक्म दिया। अल्लाह के हुक्म से हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम काअबा शरीफ की ताअमीर के नेक काम में जुट गए। हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम आसपास से पत्थर चुनकर लाते और हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम दीवार की चिनाई करते।

दीवारों की ऊंचाई के साथ पत्थर की करामत जाहिर हुई 

जैसे-जैसे काअबा शरीफ की दीवारें ऊंची होती गईं, हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के लिए ज़मीन पर खड़े होकर चिनाई करना मुश्किल होता गया। उस दौर में आज की तरह मचान या सीढ़ियां नहीं हुआ करती थी। दीवारों की चिनाई में आ रही परेशानी को देख हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम एक बड़ा पत्थर उठा लाए ताकि वालिद मोहतरम को दीवार की चिनाई करने में दुश्वारी न हो। हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम इस पत्थर पर खड़े होकर दीवार की चिनाई करने लगे। 

पत्थर का लिफ्ट की तरह ऊपर-नीचे होना 

हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम का पत्थर पर खड़े होने के साथ ही पत्थर की करामात ज़ाहिर होने लगी। हजरत इब्राहिम को जब दीवार की चिनाई करना होता, पत्थर ऊंचा हो जाता और जब उन्हें गारे की जरूरत होती, पत्थर नीचे हो जाता। इतना ही नहीं, हजरत इब्राहिम के पत्थर पर खड़ा होने के साथ ही पत्थर मोम की तरह नर्म हो गया था जबकि पत्थर की फितरत सख्ती है। इसके बावजूद हजरत इब्राहिम को उस पर खड़ा होकर दीवार की चिनाई करने में कोई दुश्वारी पेश नहीं आई। इसके बरअक्स सख्ती की फितरत वाले पत्थर पर हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के कदम पड़ते ही, वह इतना नर्म-ओ-नाजुक हो गया कि उस पर हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के कदमों के निशां बन गए जो रहती दुनिया तक अल्लाह की कुदरत की गवाही देते रहेंगे। आज वो पत्थर मुकामे इब्राहिम के नाम से काअबातुल्लाह के नज़दीक वाके है। हर रोज लाखों मुसलमां इसकी ज़ियारत करते हैं। 

हजरत उमर फारूख के दौरे खिलाफत में बदली जगह

काअबा शरीफ की ताअमीर पूरी होने के बाद भी वो पत्थर सदियों तक वहीं यानि काआबा शरीफ की दीवार से लगा रहा। लोग इसे छूकर बरकत हासिल करते थे। बाद में, यानि हज़रत उमर फारूख रदि अल्लाहह अन्हों के दौरे खिलाफत में जब तवाफ करने वाले जायरीन की तादाद बढ़ गई, इसे काअबा शरीफ की दीवार से थोड़ा पीछे हटाकर नसब किया गया, ताकि तवाफ करने वालों को कोई रुकावट न हो।

 मौजूदा शक्ल

मौजूदा दौर में इसे एक बेहद खूबसूरत, सोने और शीशे के बने क्रिस्टल के ऊंचे ढांचे में महफूज़ कर दिया गया है। काअबा शरीफ का तवाफ करने वाले हर जायरीन को यह साफ़ नज़र आता है। हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के कदमों के निशां भी बिल्कुल साफ देखे जा सकते हैं। 

कुरआन में ज़िक्र और मज़हबी अहमियत

मकाम-ए-इब्राहिम की अहमियत को इस बात से समझा जा सकता है कि अल्लाह ताअला ने इसका जिक्र कुरआन में भी किया है। सुरह अल-बकराह की आयत 125 में अल्लाह सुब्हानहू ताअला फरमाता है- 

और मकाम-ए-इब्राहिम को नमाज़ की जगह बना लो। (तर्जुमा)

    इसी हुक्म के तहत, आज भी जब कोई मुसलमान काअबा शरीफ का तवाफ पूरा करता है, तो उसके लिए मकाम-ए-इब्राहिम के पीछे खड़े होकर दो रकअत नमाज़ (वाजिब-उत-तवाफ) पढ़ना सुन्नत है। अगर भीड़ ज़्यादा हो, तो मस्जिद-अल-हरम में कही भी सामने खड़े होकर यह नमाज़ अदा की जा सकती है। 

मुझ बदनसीब को भी हासिल हुई सआदत

एक दिन मुझ बदनसीब को भी मुकामे इब्राहिम के ऐन करीब में नमाज अदा करने की सआदत हासिल हुई। और एक दिन तो हजरे असवद के ऐन सामने नमाज अदा करना नसीब हुआ। 


 


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