जिल हज्ज, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
मोमिन को पहूंचने वाली हर तकलीफ, बीमारी, गम, थकावट और फ़िक्रमन्दी के बदले उसके गुनाह मिटा दिए जाते है।
- सहीह मुस्लिम
ज़ाकिर घुरसेना : मक्का मुकर्रमा
ये वाकिया सन 8 हिजरी का है, पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ ने इसी मुकाम पर उमराह के लिए एहराम बांधा था। आज इस मुकाम पर एक आलीशान मस्जिद खड़ी है। इसे जुराना और जायराना मस्जिद भी कहा जाता है।
जानकारी के मुताबिक सन आठ हिजरी में जंग-ए-हुनैन से लौटकर आप ﷺ ने इसी मुकाम पर ठहरकर उमराह के लिए एहराम बांधा था। ताइफ़ से लौटकर जहां आप ﷺ ने मौसमे गर्मा गुजारा था और वहां के लोगों को इस्लाम पर छोड़कर आप ﷺ ने अल जुरानाह की घाटी में डेरा डाला था। अब ये आजमीने हज और उमराह जायरीन के लिए मुकामे मीकात (वो जगह जहां एहराम बांधा जाता है)
छत्तीसगढ़ के आजमीने हज ने की जियारत
हज के सफर पर मक्का पहुंचे छत्तीसगढ़ रियासत के आजमीने हज ने मक्का मुकर्रमा के मुकददस मुकामात की जियारत की। इनमें सहाफी ज़ाकिर घुरसेना भी शामिल थे। उन्होंने बताया कि मुकददस मुकामात की जियारत के दौरान उनके ग्रुप को जायराना मस्जिद की जियारत और वहां इबादत करने का सर्फ हासिल हुआ। उन्होंने बताया कि जायराना मस्जिद की अहमियत पर जामा मस्जिद, बैरन बाज़ार, रायपुर के ईमान-ओ-खतीब हजरत मौलाना हाफ़िज़-ओ- कारी डॉ इमरान अशरफी पहले ही रोशनी डाल चुके थे।
चूंकि जायराना मस्जिद के मुताल्लिक उन्हें पहले से जानकारी मिल चुकी थी, इसलिए वहां पहुंचकर मस्जिद की जियारत और वहां इबादत करने की उनकी लज्जत और बढ़ गई थी। मक्का शरीफ के दीगर मकामात की जियारत कर लौटते हुए उन्होंने मस्जिद जायराना में दो रकअत नमाज अदा की और उमराह की नियत कर काअबातुल्ला पहुंचे यहां उन्होंने उमराह किया। इस दौरान उन्होंने हर मुसलमान के लिए मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा के मुकददस मुकामात की जियारत और हज व उमराह की सआदत नसीब होने की दुआएं की।

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