जीअकादा, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
अल्लाह ताअला ने मेरी उम्मत के दिलों में पैदा होने वाले वसवसों को माफ कर दिया है, जब तक वो उस पर अमल न करे या ज़बान पर ना लाए।
- सहीह बुख़ारी
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मदारिस-ए-इस्लामिया हमारी दीनी, तहज़ीबी और इल्मी शनाख़्त के वो मज़बूत सतून हैं, जिन्होंने सदियों से ईमान की शम्मा रोशन रखी है। ये महज तालीमी इदारे नहीं बल्कि दीन के क़िले, अख़लाक़ के मराकज़ और मुआशरती रहनुमाई के सर चश्मे हैं। बर्र-ए-सग़ीर की तारीख़ इस बात की गवाह है कि जब भी दीन-ओ-मिल्लत पर कोई मुश्किल वक़्त आया, मदारिस ने अपने किरदार से ना सिर्फ कौम की हिफ़ाज़त की बल्कि नई नसल को शऊर, इल्म और इस्तिक़ामत भी अता की।
आज जरूरत हर ज़िंदा निज़ाम की तरह मदारिस को भी वक़्त के तक़ाज़ों के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने की है। ये तस्लीम करने में कोई हर्ज नहीं कि मौजूदा दौर में कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर तवज्जा देना नागुज़ीर हो चुका है, ताकि मदारिस का वक़ार भी बरक़रार रहे और उनकी इफ़ादीयत भी मज़ीद बढ़ सके। आज हुकूमत की जानिब से भी तालीमी-ओ-फ़लाही इदारों के लिए मुख़्तलिफ़ उसूल, रहनुमा हिदायात और क़ानूनी तक़ाज़े मुक़र्रर किए जा रहे हैं। ऐसे में मदारिस के लिए ज़रूरी है कि वो अपनी शनाख़्त और ख़ुदमुख़तारी बरक़रार रखते हुए इन ज़रूरी सरकारी तक़ाज़ों को पूरा करें जो शफ़्फ़ाफ़ियत, नज़म-ओ-नसक़ और इदारा जाती मज़बूती के लिए लाज़िम समझे जाते हैं। ये तर्ज़-ए-अमल ना सिर्फ मदारिस के तहफ़्फ़ुज़ का ज़रीया बनेगा बल्कि मुआशरे में उनके वक़ार और एतिमाद को भी मज़ीद मुस्तहकम करेगा।
अहम मसला शफ़्फ़ाफ़ियत (ट्रांसपेरेंसी) का है। आज के दौर में जब हर इदारा अपने माली मुआमलात को वाजेह और मुनज़्ज़म रखता है, मदारिस के लिए भी ज़रूरी है कि वो अपनी आमद-ओ-ख़र्च की बाक़ायदा ऑडिट रिपोर्ट तैयार करें। ये ना सिर्फ एतिमाद में इज़ाफ़ा करेगा बल्कि उन हज़रात के लिए भी इतमीनान का बाइस होगा, जो अपने सदक़ात-ओ-अतयात मदारिस को देते हैं। अगर हर मुदर्रिसा सालाना ऑडिट रिपोर्ट शाइआकरे और उसे अवाम के लिए दस्तयाब बनाए तो इससे बद-गुमानियों का ख़ातमा होगा और इदारे की साख मज़बूत होगी।
इसके साथ-साथ मदारिस का क़ानूनी रजिस्ट्रेशन, ज़मीन के काग़ज़ात, इमारत से मुताल्लिक़ दस्तावेज़ात, ट्रस्ट या सोसाइटी के रिकार्ड और हुकूमत की जानिब से वक़तन-फ़-वक़तन जारी किए जाने वाले सरकूलर्ज-ओ-रहनुमा हिदायात पर अमल दरआमद भी बेहद ज़रूरी है। एक मुनज़्ज़म और दस्तावेज़ी निज़ाम मदारिस को ग़ैर ज़रूरी एतराज़ात, क़ानूनी पेचीदगीयों और इंतिज़ामी दुशवारीयों से महफ़ूज़ रख सकता है।
इसी तरह एकाऊंट मेंटेंन्स का जदीद निज़ाम अपनाना भी वक़्त की अहम ज़रूरत है। रिवायती रजिस्टरों के साथ-साथ डीजीटल एकाऊंटिंग सिस्टम को शामिल किया जाए, ताकि रिकार्ड महफ़ूज़ भी रहे और बवक़्त-ए-ज़रूरत आसानी से दस्तयाब भी हो सके। इससे माली नज़म-ओ-नसक़ में बेहतरी आएगी और किसी भी किस्म की बे ज़ाबितगी के इमकानात कम होंगे।
मज़ीद बरआँ, मदारिस में टैक्नोलोजी का इस्तिमाल बढ़ाना भी निहायत ज़रूरी है । आज दुनिया डीजीटल हो चुकी है, ऐसे में मदारिस अगर टैली सिस्टम, ऑनलाइन रिकार्ड और डीजीटल कम्यूनीकेशन को अपनाए तो ना सिर्फ उनका इंतिज़ामी निज़ाम बेहतर होगा बल्कि तलबा को भी जदीद तक़ाज़ों से हम-आहंग होने का मौक़ा मिलेगा। ऑनलाइन क्लासिज़, डीजीटल लाइब्रेरी, ई लर्निंग प्लेटफ़ार्मज़ मदारिस के तालीमी मयार को एक नई जिहत दे सकते हैं। कम्यूनीकेशन सेंटर, जदीद साईंस, टैक्नोलोजी वग़ैरा सब ही मदारिस को तक़वियत देने में मददगार हो सकते हैं।
एक और अहम पहलू सरकारी ज़वाबत और क़ानूनी तक़ाज़ों की पासदारी है। हक़ीक़त ये है कि हुकूमत की जानिब से मदारिस के ताल्लुक़ से जो एतराज़ात या शकूक सामने आते हैं, उनमें अक्सर मुआमलात दस्तावेज़ी कमज़ोरी, ग़ैर मुनज़्ज़म रिकार्ड, ग़ैर वाज़िह माली निज़ाम, या क़ानूनी तक़ाज़ों की अदम-तकमील से जुड़े होते हैं। अगर मदारिस अपने तमाम मुआमलात शफ़्फ़ाफ़, मुनज़्ज़म और क़ानून के मुताबिक़ रखें तो ना सिर्फ बहुत सी ग़लत-फ़हमियाँ ख़ुद बख़ुद ख़त्म हो सकती हैं बल्कि मदारिस के ख़िलाफ़ पैदा होने वाली मनफ़ी फ़िज़ा को भी कम किया जा सकता है। वक़्त का तक़ाज़ा ये भी है कि मदारिस दिफ़ाई ज़हन के बजाय तामीरी और मुनज़्ज़म तर्ज़-ए-फ़िक्र अपनाए, ताकि उनके ख़िलाफ़ उठने वाले सवालात का जवाब अमली तौर पर दिया जा सके।
इस जानिब भी दें तवज्जो
इसके साथ-साथ निसाब में तवाज़ुन भी ज़रूरी है। दीनी उलूम के साथ बुनियादी असरी उलूम जैसे उर्दू, हिन्दी, अंग्रेज़ी, रियाज़ी और कम्पयूटर की तालीम शामिल की जाए, ताकि फ़ारग़ीन मदारिस ना सिर्फ दीन के आलिम हों, बल्कि मुआशरे में बावक़ार रोज़गार के मवाक़े भी हासिल कर सकें। इसके इलावा इलाक़ाई ज़बानों पर भी तवज्जा दी जानी चाहिए ताकि तलबा अपने मुक़ामी समाज और माहौल से बेहतर अंदाज़ में जुड़ सकें। उर्दू, अरबी और फ़ारसी रस्म-उल-ख़त और ख़त्ताती की तालीम-ओ-तर्बीयत पर बड़े पैमाने पर ख़ुसूसी तवज्जा दी जाए, क्योंकि ये सिर्फ़ ज़बान या फ़न नहीं बल्कि हमारी तहज़ीबी शनाख़्त और इलमी विरसे का अहम हिस्सा है। अगर मदारिस इस फ़न को जदीद अंदाज़ में फ़रोग़ दें तो नई नसल अपनी तहज़ीब, ज़बान और इलमी रिवायत से मज़बूत ताल्लुक़ क़ायम रख सकेगी।
ये तमाम मश्वरे मदारिस की रूह या मक़सद को तबदील करने के लिए नहीं बल्कि उसे मज़ीद मज़बूत और मोस्सर बनाने के लिए हैं। हमें ये समझना होगा कि शफ़्फ़ाफ़ियत, नज़म-ओ-ज़बत, और जदीद तक़ाज़ों को अपनाना दीन से दूरी नहीं बल्कि दीन की ख़िदमत का एक नया अंदाज़ है।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि मदारिस हमारे सिरों के ताज हैं और ताज को मज़ीद चमकदार बनाने के लिए उसकी देख-भाल ज़रूरी है। अगर हमने बरवक़्त इस्लाहात को अपना लिया तो मदारिस ना सिर्फ अपने माज़ी की शान बरक़रार रखेंगे बल्कि मुस्तक़बिल में भी दीन-ओ-मिल्लत की रहनुमाई का फ़रीज़ा भरपूर तरीक़े से अंजाम देते रहेंगे।
याद रखना चाहिए कि ज़माना बदल रहा है, सवालात बदल रहे हैं और इदारों को परखने के पैमाने भी बदल चुके हैं। ऐसे में मदारिस के तहफ़्फ़ुज़ का रास्ता सिर्फ जज़बाती नारों में नहीं बल्कि मज़बूत निज़ाम, शफ़्फ़ाफ़ किरदार, इलमी वक़ार, क़ानूनी तैयारी और दूर-अँदेश क़ियादत में पोशीदा है। जो इदारे वक़्त के तक़ाज़ों को समझ लेते हैं, वही तारीख़ में ज़िंदा रहते हैं। मदारिस अगर अपनी दीनी रूह को बरक़रार रखते हुए नज़म, शफ़्फ़ाफ़ियत, टैक्नोलोजी, असरी शऊर और तहज़ीबी शनाख़्त को साथ लेकर चलें तो वो ना सिर्फ हर एतराज़ का जवाब बन सकते हैं बल्कि आने वाली नसलों के लिए एक मिसाली, बावक़ार और नाक़ाबिल-ए-शिकस्त तालीमी निज़ाम की सूरत इख़तियार कर सकते हैं। यही वक़्त की आवाज़ है, यही मिल्लत की ज़रूरत है, और यही मदारिस के रोशन और महफ़ूज़ मुस्तक़बिल की हक़ीक़ी ज़मानत है।
- IPS ( Rid. DG)

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