मुहर्रम उल हराम, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
आदमी अपने दोस्त के दीन पर होता है, पस तुम में से हर एक को देखना चाहिए कि वह किसको दोस्त बना रहा है।
- तिरमीज़ी
बरकत उल्लाह यूनीवर्सिटी का नाम तब्दील करने को लेकर छिड़ी बहस
✅ बख्तावर अदब : भोपाल
7 जुलाई बर्र-ए-सग़ीर के एक ऐसे अज़ीम सपूत की यौम पैदाइश है, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी बर्तानवी हुकूमत के ख़िलाफ़ जद्द-ओ-जहद में गुज़ार दी, मगर अफ़सोस कि नई नसल का एक बड़ा तबक़ा उनके नाम और उनकी ख़िदमात से भी वाक़िफ़ नहीं।
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हम बात कर रहे हैं मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली की जिन्हें भारत की आज़ादी के उन किरदारों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने वतन से हज़ारों मील दूर रह कर भी आज़ादी की शम्मा रोशन रखी।
यहां यह गौरतलब है कि उनके नाम पर क़ायम बरकत उल्लाह यूनीवर्सिटी का नाम तब्दील करने को लेकर बहस छिड़ी हुई है। मुआमले में सियासी आरा मुख़्तलिफ़ हो सकती हैं, लेकिन इस तनाज़े ने एक बुनियादी सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया है कि हम अपने मुजाहिदीन-ए-आज़ादी को उनकी ख़िदमात की बुनियाद पर याद भी रखते हैं या नहीं। यहां ये भी याद रखना जरूरी है कि क़ौमों की शिनाख़्त महज उनके हाल से नहीं बल्कि उनके माज़ी, सियासी शऊर और तारीख़ से भी होती है, और जब तारीख़ के नुमायां किरदार ही सवालों के घेरे में आ जाएं तो नुक़्सान सिर्फ एक शख़्सियत का नहीं, पूरी क़ौमी का होता है।
7 जुलाई 1854 को भोपाल में पैदा होने वाले मौलाना बरकत उल्लाह ग़ैरमामूली इल्मली सलाहीयतों के मालिक थे। अरबी, फ़ारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी समेत मुतअद्दिद ज़बानों पर उबूर रखते थे। उन्होंने जापान, अमरीका, जर्मनी और अफ़्ग़ानिस्तान जैसे ममालिक में रह कर बर्तानवी हुकूमत के ख़िलाफ़ आलमी सतह पर भारत की आज़ादी की तहरीक को बैन-उल-अक़वामी आवाज़ देने में अहम किरदार अदा किया। वो उन चंद इन्क़िलाबी रहनुमाओं में थे, जिन्होंने आज़ादी की जद्द-ओ-जहद को सिर्फ भारत तक महिदूद नहीं रखा बल्कि उसे आलमी सतह पर मोस्सर अंदाज़ में पेश भी किय।
तारीख़ का एक अहम बाब ये भी है कि 1915 में काबुल में क़ायम होने वाली आरिज़ी हुकूमत में राजा महेंद्र प्रताप सदर जबकि मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली वज़ीर-ए-आज़म मुक़र्रर हुए। इस हुकूमत का मक़सद दुनिया को ये पैग़ाम देना था कि भारत सिर्फ एक ग़ुलाम मुल्क नहीं बल्कि आज़ादी का हक़ रखने वाली क़ौम है।
मौलना बरकत उल्ला के नाम पर तनाजा क्यों
यहां एक सवाल अपनी जगह क़ायम है। अगर राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर आज मुल्क में यूनीवर्सिटी क़ायम है और इस पर किसी को एतराज़ नहीं, तो फिर मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली के नाम पर क़ायम इदारे पर तनाज़ा क्यों? ये किसी शख़्सियत को कम या ज़्यादा साबित करने की कोशिश नहीं बल्कि इन्साफ़ का सवाल है। हक़ीक़त ये है कि मौलाना बरकत अल्लाह ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा जिलावतनी में गुज़ारा और बैरून-ए-मुल्क के ही हो कर रह गए, बैरून-ए-मुल्क रह कर आज़ादी-ए-भारत के लिए आलमी हिमायत हासिल करने की कोशिश की, इन्क़िलाबी लिटरेचर तैयार किया और बर्तानवी साम्राज्य के ख़िलाफ़ एक मज़बूत फ़िक्री महाज़ क़ायम किया।
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अगर वाक़ई हम मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली की ख़िदमात का एतराफ़ करना चाहते हैं तो ये एतराफ़ सिर्फ़ उनका नाम बरक़रार रखने तक महिदूद नहीं होना चाहिए, बल्कि अमली इक़दामात की सूरत में भी नज़र आना चाहिए। वक़्त का तक़ाज़ा है कि बरकत उल्लाह यूनीवर्सिटी को मर्कज़ी यूनीवर्सिटी का दर्जा दिया जाए ताकि उनके नाम से मंसूब ये इदारा क़ौमी सतह पर इल्मी-ओ-तहक़ीक़ी मर्कज़ बन सके। इसके साथ ही भोपाल और मुलक के दीगर हिस्सों में उनके नाम से मज़ीद आला तालीमी-ओ-तहक़ीक़ी इदारे क़ायम किए जाएं।
जिस शख़्सियत ने अपनी पूरी ज़िंदगी भारत की आज़ादी, इलम और क़ौमी बेदारी के लिए वक़्फ़ कर दी, उस की याद सिर्फ़ तक़रीबात या सालगिराओं तक महिदूद नहीं रहनी चाहिए, बल्कि तालीमी इदारों, तहक़ीक़ी मराकज़ और नई नसल की फ़िक्री तर्बीयत के ज़रीये ज़िंदा रहनी चाहिए। कौमें अपने मुहसिनों का एहतिराम सिर्फ़ अलफ़ाज़ से नहीं बल्कि ऐसे इदारे क़ायम कर के करती हैं जो आने वाली नसलों को उनकी फ़िक्र, जद्द-ओ-जहद और क़ुर्बानियों से रोशनास कराते रहीं।
मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली ने अपनी पूरी ज़िंदगी वतन की आज़ादी के लिए वक़्फ़ कर दी, मगर उन्हें अपने वतन की मिट्टी भी नसीब ना हो सकी। 20 सितंबर, 1927 को अमरीका के शहर सान फ्रांसिस्को में उनका इंतिक़ाल हुआ, जिसके बाद उन्हें कैलीफोर्निया के शहर सेकरामंटो में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। ये हक़ीक़त आज भी हर मुहिब-ए-वतन को सोचने पर मजबूर करती है कि जिस शख़्स ने भारत की आज़ादी के लिए पूरी दुनिया में जद्द-ओ-जहद की, उसकी आख़िरी आरामगाह अपने वतन से हज़ारों मील दूर है। ऐसे मुजाहिद-ए-आज़ादी की याद को महिज़ तक़रीबात तक महिदूद रखना उनके साथ इन्साफ़ नहीं होगा।
मौलाना बरकत अल्लाह की फ़िक्र का एक नुमायां पहलू क़ौमी इत्तिहाद था। वो समझते थे कि आज़ादी की जद्द-ओ-जहद उस वक़्त तक कामयाब नहीं हो सकती, जब तक मुल्क के तमाम तबक़ात और मज़ाहिब एक मुशतर्का मक़सद के लिए मुत्तहिद ना हों। उनके नज़दीक वतन सब का मुशतर्का सरमाया है और आज़ादी भी सबकी मुशतर्का ज़िम्मेदारी।
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- बरकत उल्लाह यूनीवर्सिटी को मर्कज़ी यूनीवर्सिटी का दर्जा दिया जाए ताकि ये इदारा क़ौमी सतह पर तहक़ीक़, आला तालीम और फ़िक्री रहनुमाई का मर्कज़ बन सके।
- मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली के नाम से क़ौमी और रियास्ती सतह पर उर्दू, अरबी और फ़ारसी यूनीवर्सिटीयां क़ायम की जाएं, जहां उन ज़बानों के साथ तहज़ीब, तारीख़ और बैन-उल-अक़वामी मुतालआत पर आला मेअयार की तहक़ीक़ हो।
- उनके नाम से उर्दू सहाफ़त, अरबी, फ़ारसी, बैन-उल-अक़वामी ताल्लुक़ात, आज़ादी की तहरीक और क़ौमी यकजहती पर ख़ुसूसी तहक़ीक़ी मराकज़ क़ायम किए जाएं ताकि नई नसल उनकी फ़िक्र और ख़िदमात से रोशनास हो सके।
- जिस तरह हुकूमत यहां हाईकोर्ट बैंच क़ायम करना चाहती है, नए इदारे क़ायम करती हैं और मुख़्तलिफ़ मन्सूबों को मंज़ूरी देती हैं, इसी जज़बे के साथ मुजाहिदीन-ए-आज़ादी के नाम पर भी तालीमी, तहक़ीक़ी और सक़ाफ़्ती इदारों का एक मज़बूत नेटवर्क क़ायम किया जाना चाहिए, ताकि क़ौम अपने असल हीरोज़ से मुसलसल जुड़ी रहे।
- मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली के साथ काबुल की आरिज़ी हुकूमत और तहरीक आज़ादी से वाबस्ता दीगर मुजाहिदीन के नाम पर हॉस्टल, कॉलेज, लाइब्रेरियां, रिसर्च इंस्टीटियूट, स्कालरशिप और यादगारी लैक्चर सीरीज़ शुरू किए जाएं। इससे ना सिर्फ आज़ादी की मुशतर्का तारीख़ महफ़ूज़ होगी बल्कि भारत की गंगा जमुनी तहज़ीब, क़ौमी यकजहती, बाहमी एहतिराम और भाईचारे का पैग़ाम भी आने वाली नसलों तक पहुँचेगा।
काबिल-ए-ग़ौर है कि हुकूमत ने एक ऐसी ज़बान के फ़रोग़ के लिए तक़रीबन 18 यूनीवर्सिटी (सोशल मीडीया से मिली मालूमात के मुताबिक़) क़ायम की हैं जो तकरीबन फ़ौत हो चुकी है, जिसके बोलने वाले बहुत कम है। लेकिन सवाल ये है कि जब संस्कृत जैसी ज़बान के लिए इतने वसीअ पैमाने पर इदारे क़ायम किए जा सकते हैं तो उर्दू, अरबी और फ़ारसी जैसी ज़बानों के लिए, जो आज भी भारत और बैन-उल-अक़वामी सतह पर लाखों शहरियों की इलमी, अदबी, मज़हबी और सक़ाफ़्ती ज़िंदगी का हिस्सा हैं और जिनका बैन-उल-अक़वामी असर भी बहुत वसीअ है, क़ौमी सतह पर इसी संजीदगी के साथ जामा इदारे क्यों क़ायम नहीं किए जाते?
ज़बानों की तरक़्क़ी को मुक़ाबले का नहीं बल्कि इलमी तनव्वो और क़ौमी सरमाए के फ़रोग़ का ज़रीया समझना चाहिए। अगर भारत वाक़ई अपनी कसीर लिसानी और कसीर तहज़ीबी शनाख़्त को मज़बूत बनाना चाहता है तो उर्दू, अरबी और फ़ारसी के फ़रोग़ को भी क़ौमी तर्जीहात में नुमायां मुक़ाम देना होगा, और इससे बेहतर ख़राज-ए-अक़ीदत मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली जैसे अज़ीम आलिम और मुजाहिद-ए-आज़ादी के लिए और क्या हो सकता है।
अफ़सोस कि आज उनका ज़िक्र सिर्फ किसी तनाज़े के मौक़ा पर होता है, जबकि उनकी शख़्सियत इससे कहीं बड़ी है। तारीख़ के अहम किरदारों को फ़रामोश करना किसी भी क़ौम के लिए नुक़्सानदेह होता है। कौमें अपने हीरोज़ को इसलिए याद रखती हैं कि आने वाली नसलें जान सकें और जानने के साथ साथ उनसे मुतास्सिर हो कि आज़ादी सिर्फ मैदान-ए-जंग में नहीं, बल्कि जिलावतनी, फ़िक्री जद्द-ओ-जहद, सिफ़ारतकारी और मुसलसल क़ुर्बानियों से हासिल होती है।
मौलाना बरकत उल्लाह भोपाली की यौम पैदाइश हमें यही पैग़ाम देती है कि तारीख़ को ताअस्सुब या सियासत के चश्मे से नहीं बल्कि हक़ायक़ की रोशनी में पढ़ा जाए। अगर हम अपने मुजाहिदीन-ए-आज़ादी को भुला देंगे तो आने वाली नसलों से अपनी ही तारीख़ का एक अहम बाब छीन लेंगे।
बरकत उल्लाह भोपाली सिर्फ़ भोपाल या किसी एक तबक़े की शख़्सियत नहीं थे, बल्कि वो भारत की आज़ादी की इस मुशतर्का जद्द-ओ-जहद की अलामत हैं, जिसमें मज़हब, ज़बान और इलाक़ाई शनाख़्त से बालातर होकर वतन को आज़ाद कराने का ख़ाब देखा गया था। उनका नाम सिर्फ एक यूनीवर्सिटी का नाम नहीं, बल्कि भारत की आज़ादी की तारीख़ का एक रोशन बाब है। अगर हम अपने ऐसे हीरोज़ को फ़रामोश करने लगेंगे तो तारीख़ हमें भी फ़रामोश कर देगी और भारत की एक बहुत बड़ी मुशतर्का विरासत, तहज़ीब, भाईचारगी कहीं गुम हो जाएगी।

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