उर्दू के जनाज़े में खामोश खड़े थे खुद उर्दू के सिपाही

 शाअबान उल मोअज्जम, 1447 हिजरी 

   फरमाने रसूल   

"बेहतर दोस्त अल्लाह के नज़दीक वो है, जो अपने दोस्तों में बेहतर हो और बेहतरीन पड़ोसी वो है जो अपने पड़ोसियों के हक़ में बेहतर हो।

- तिर्मिज़ी


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उर्दू के नाम पर क़ायम इदारे के बैनर से उर्दू ग़ायब
कैसे होगा उर्दू का फ़रोग़ : एमडब्ल्यू अंसारी
 

✅ बख्तावर अदब : भोपाल 

    ये कैसा अजब मंज़र है। नाम उर्दू स्कूल का, दावा उर्दू तहज़ीब का, प्रोग्राम ऑल इंडिया मुशायरा का लेकिन बैनर से उर्दू रस्म-उल-ख़त ही नदारद। गोया दूलहा भी मौजूद है, बारात भी और महफ़िल भी, बस-दुल्हन ग़ायब है
    छाओनी, औरंगाबाद (संभाजी नगर) में होने वाले इस मुशायरे के फ्लेक्स को देखकर दिल ख़ुश नहीं, ज़ख़मी होता है। ये महज एक डिज़ाइन की ग़लती नहीं, ये ज़हनी रवैय्ये की अक्कासी है। ये वही बीमारी है, जिसमें ज़बान से मुहब्बत के दावे किए जाते हैं, मगर अमल में इसकी शनाख़्त मिटा दी जाती है।
    अफ़सोस इस बात का कि इस स्टेज पर आने वाले नाम कोई आम नहीं हैं, उर्दू के बहर-ए-ज़ख़्ख़ार हैं, जिन्हें उर्दू ही के नाम से जाना जाता है। तमाम लोग उर्दू के हैं, उर्दू के शायर हैं, मुहब्बाने उर्दू हैं, उर्दू की नुमाइंदगी करने का दम भरने वाले चेहरे हैं। मगर सवाल है कि अगर उर्दू के नुमाइंदे ख़ुद अपने नाम की पहचान स्टेज से ग़ायब देखकर ख़ामोश रहें, तो फरियाद कौन करेगा।
    प्रोग्राम के मुंतज़मीन यक़ीनन तालीम और अदब से वाबस्ता लोग हैं, इसीलिए उन से तवक़्क़ो भी आम लोगों से ज़्यादा है। एक ऐसे इदारे की जानिब से, जिसके नाम में ही उर्दू शामिल हो, उर्दू रस्म-उल-ख़त को नज़रअंदाज करना महज फ़न्नी कोताही नहीं बल्कि तर्जीहात का इज़हार महसूस होता है। मुंतज़मीन का फ़र्ज़ सिर्फ़ प्रोग्राम मुनाकिद करवा देना नहीं बल्कि इस ज़बान की तहज़ीबी नुमाइंदगी भी है, जिसके नाम पर इदारा क़ायम है। अगर स्टेज, बैनर और दावत नामे पर उर्दू को उसकी असल शक्ल में जगह ना मिले तो ये कमी सबसे पहले मुंतज़मीन की ज़िम्मेदारी बनती है। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि वो इस तन्क़ीद को मुख़ालिफ़त नहीं बल्कि इस्लाह की आवाज़ समझेंगे।
    इसी तरह का एक और मुशायरा घरगोन में भी मुनाक़िद हुआ जिसके बैनर से भी उर्दू नदारद रही। कारवाँ-ए-उर्दू खरगोन ने ऑल इंडिया मुशायरा और कवी सम्मेलन मुनाक़िद किया लेकिन कारवाँ-ए-उर्दू तंज़ीम ने उर्दू को नजरअंदाज़ किया जो इंतिहाई काबिल-ए-अफ़सोस है जिसकी इस्लाह किया जाना इंतिहाई अहम-ओ-ज़रूरी है।
    वाजेह रहे कि मुशायरा सिर्फ़ शायरी पढ़ने का नाम नही, वो उर्दू तहज़ीब, उर्दू रस्म-उल-ख़त, उर्दू शिनाख़्त और उर्दू वक़ार की नुमाइंदगी भी होता है। जब बैनर पर उर्दू नहीं होगी तो ये पैग़ाम जाएगा कि ज़बान सिर्फ़ तक़रीर तक महदूद है।
    ये वही रविश है, जिसने पहले तालीमी इदारों से उर्दू निकाली, फिर दफ़्तरों से, फिर साइन बोर्डज़ से और अब मुशायरों के स्टेज से भी उर्दू रस्म-उल-ख़त ग़ायब कर दिया जा रहा है। जिस इदारे का वजूद ही उर्दू के नाम पर है, उसके प्रोग्राम के बैनर पर उर्दू रस्म-उल-ख़त की जगह नहीं, ये बे-हिसी नहीं तो और किया है। 
    एक और अहम पहलू ये है कि अंग्रेज़ी को फ़ौक़ियत देना अब एक आम रविष बनती जा रही है, मगर सवाल ये है कि हर खित्ते की अपनी मुक़ामी ज़बानों को वो मुक़ाम क्यों नहीं दिया जाता जिसकी वो हक़दार हैं। महाराष्ट्र में मराठी, तमिलनाडू में तमिल, केराला में मलयालम ज़बानें सिर्फ बोली नहीं जातीं बल्कि वहां की तारीख़, सक़ाफ़्त और शिनाख़्त की बुनियाद हैं। अगर हम वाक़ई लिसानी हम-आहंगी और सक़ाफ़्ती एहतिराम की बात करते हैं, तो उर्दू के साथ-साथ मुक़ामी ज़बानों को भी नुमायां करना होगा। 
    ज़बानों को मुक़ाबिल नहीं, साथ लेकर चलने की ज़रूरत है। यही तर्ज़-ए-फ़िक्र मुल्क की असल कसरत में वहदत की तस्वीर पेश कर सकता है, वर्ना सिर्फ अंग्रेज़ी को स्टेज पर बिठा कर हम अपनी जड़ों को ख़ुद कमज़ोर कर रहे होते हैं।



    हमें ये समझना होगा कि ज़बान सिर्फ़ बोलने की चीज़ नहीं, ज़बान एक शिनाख़्त है, एक तारीख़ है, एक तहज़ीब है, एक जज़बाती वाबस्तगी है। जब रस्म-उल-ख़त ग़ायब होता है तो दरअसल ज़बान की रूह ज़ख़मी होती है। आज ज़रूरत इस बात की है कि मुशायरे में शरीक होने वाले तमाम शोरा-ए-कराम और मेहमाने -ए-ख़ुसूसी इस पर आवाज़ उठाएं। कम अज़ कम स्टेज से ये आवाज़ ज़रूर उठाई जाए कि ''उर्दू के मुशायरे में उर्दू रस्म-उल-ख़त क्यों नहीं; वर्ना तारीख़ यही लिखेगी कि उर्दू के सिपाही ही उर्दू के जनाज़े में ख़ामोश खड़े थे।

✒ आईपीएस (रिटा. डीजीपी, छत्तीसगढ़)

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