शाअबान उल मोअज्जम, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जो चीज़ सबसे ज़्यादा लोगों को जन्नत में दाखिल करेगी, वो है ख़ौफ-ए-खुदा और हुस्न-ए-अखलाक।
-तिर्मिज़ी
जलसा मुनाकिद कर शेख़ जलीस अहमद आजमी को दी गई खिराजे अकीदत
✅ बख्तावर अदब : भोपाल
यौमे जम्हूरिया के मौके पर 26 जनवरी को माअरूफ़ समाजी-ओ-फ़लाही तंज़ीम पियो पुलिस वेल्फेयर एसोसीएशन के ज़ेर-ए-एहतिमाम सलाह उद्दीन अय्यूबी मेमोरियल स्कूल एंड जूनीयर कॉलेज, भिवंडी में एक निहायत बावक़ार, रूह-परवर और इलमी-ओ-समाजी वक़ार से भरपूर जलसा ताज़ियती इनइक़ाद किया गया। मुमताज़ समाजी शख़्सियत, मिली रहनुमा, सर सय्यद के सच्चे पैरोकार शेख़ जलीस अहमद मरहूम की हयात-ओ-ख़िदमात को ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने की गरज से मुनाकिद इस जलसे में कसीर तादाद में लोगों ने शिरकत कर इजहारे खयाल किया। इस दौरान मरहूम आज़मी की इलमी अदबी, समाजी-ओ-मिली ख़िदमात पर लिखी किताब 'कारगह-ए-हयात के ताबिंदा नुक़ूश' का इजरा भी अमल में आया।प्रोग्राम की सदारत सदर पीडब्लयूए अब्बू ज़फ़र हस्सान अहमद नदवी ने की, जबकि मेहमान-ए-ख़ुसूसी की हैसियत से रिटायर्ड आईपीएस और साबिक़ डीजीपी एमडब्लयू अंसारी ने शिरकत की। रस्म-ए-इजरा एडवोकेट सुप्रीमकोर्ट जेडके फ़ैज़ान के हाथों अंजाम पाया।
जलसे से खिताब करते हुए मेहमान-ए-खुसूसी एमडब्लयू अंसारी ने कहा, शेख़ जलीस अहमद मरहूम सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि किरदार, दयानत, समाजी ज़िम्मेदारी और इन्सान दोस्ती की जीती-जागती मिसाल थे। ऐसे अफ़राद मुआशरे की अख़लाक़ी बुनियादों को मज़बूत करते हैं। आज के माहौल में उनकी ज़िंदगी नई नसल के लिए एक अमली दरसगाह है।
उन्होंने मज़ीद कहा कि असल अज़मत ओहदों से नहीं बल्कि किरदार से पैदा होती है, और जलीस अहमद मरहूम की पूरी ज़िंदगी इस उसूल की अमली नमूना थी। उन्होंने नौजवानों को तलक़ीन की कि वो ख़िदमत-ए-खल्क को अपना शआर बनाएँ और मुआशरे में अख़लाक़ी बेदारी पैदा करें।
मुक़र्ररीन ने इस बात पर रोशनी डाली कि शेख़ जलीस अहमद मरहूम की ज़िंदगी का आग़ाज़ ऐसे घराने में हुआ, जहां इलम-ए-दीन, अख़लाक़ और समाजी शऊर हम-आहंग थे। उनके वालिद मुहतरम शेख़ सग़ीर अहमद मरहूम एक निहायत बावक़ार, दयानतदार और इन्सान दोस्त शख़्सियत थे, जिनकी नेक सीरती, सच्चाई, जुरात और ख़िदमत-ए-ख़लक़ का जज़बा जलीस अहमद मरहूम की शख़्सियत में पूरी तरह झलकता था।
ये वाजेह किया गया कि वालदैन की अमली सीरत नसलों तक मुंतक़िल होती है, और जलीस जलीस अहमद मरहूम की ज़िंदगी इस हक़ीक़त का रोशन सबूत थी। उनकी ज़िंदगी के फ़ैसले इन्ही उसूलों पर मबनी थे, जो बचपन से उनमें रासिख़ किए गए थे।
इजलास में एमएलए भीवनडी मशरिक़, रईस क़ासिम शेख़ ने ख़ुसूसी तौर पर शिरकत की। इनके अलावा मोमिन रशीद ताहिर, रियाज़ आज़मी, अजय यादव, रिज़वान मिस्टर, रविश अंसारी, ज़िया अल रहमान, अंसारी अनस और इमतियाज़ ख़लील वग़ैरा समेत कई मुमताज़ समाजी-ओ-तालीमी शख़्सियात ने शिरकत की और मरहूम की ख़िदमात को ख़राज-ए-तहसीन पेश किया।
एडवोकेट सुप्रीमकोर्ट और प्रोग्राम के मेहमान जेडके फ़ैज़ान ने कहा कि इजलास का मक़सद महज ताज़ियत नहीं बल्कि नई नसल को ये पैग़ाम देना था कि मुआशरे की असल ताक़त बा किरदार अफ़राद होते हैं। शेख़ जलीस अहमद मरहूम की ज़िंदगी इस बात की गवाह है कि ख़ुलूस, दयानत और ख़िदमत-ए-ख़लक़ के ज़रीये इन्सान हमेशा ज़िंदा रहता है। उन्होंने मज़ीद कहा कि उनके मिशन को आगे बढ़ाएं, यही उनके लिए सच्ची ख़िराज-ए-अक़ीदत होगी।
तक़रीब के इख़तताम पर अब्बू ज़फ़र हस्सान नदवी ने शेख़ जलीस और उनके तमाम रफ़क़ा के लिए दुआए मग़फ़िरत कराई नीज़ इस अज़म का इज़हार किया कि मरहूम के मिशन 'इन्सानियत, अख़लाक़ी बेदारी और समाजी ख़िदमत' को जारी रखा जाएगा।


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