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रमजान उल मुबारक, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जिस शख्स का मकसद आखेरात की बेहतरी हो, अल्लाह ताअला उसके दिल को गनी कर देता है, उसके बिखरे हुए कामों को समेट देता है और दुनिया ज़लील हो कर उसके पास आती हैं।
- तिर्मीज़ी शरीफ
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रोजा रखने के साथ ज्यादातर घरों की बदल गई रूटीन
✅ बख्तावर अदब : भिलाई
माहे रमजान का पहला अशरा गुजरने को है। रोजा रखने के साथ ही लोग इबादात में मशगूल हैं। इसकी वजह से कई घरों की रूटीन काफी बदल गई है। हर रोज सहरी के वक्त उठने से लेकर शाम को इफ्तार और रात में तरावीह के अलावा नफली इबादात का सिलसिला जारी है। रमजानुल मुबारक की अजमत को देखते हुए लोग इबादत के साथ-साथ दूसरी तैयारियों में भी मशरूफ हैं। मस्जिदों में नमाजियों की तादाद बढ़ गई है, वहीं अफ्तार के वक्त लोग एक साथ रोजा खोलने जुट रहे हैं।
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| मौलाना सैय्यद फैसल अमीन |
मुफ्ती मोहम्मद सोहेल काजी, दारूल कजा कहते हैं, रोजा हर बालिग, आकिल मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है। इसलिए इसकी पाबंदी का खास ख्याल रखना चाहिए। रोजे से सिर्फ बीमारों और मुसाफिरों को छूट है। वो भी इस शर्त के साथ कि बाद में इसकी भरपाई कर ली जाए। बीमार जबसेहतमंद हो जाए और मुसाफिर अपने मुकाम पर पहुंच जाए तो उसे अपने छूटे हुए रोजे पूरे कर लेने चाहिए।
शेखुल हदीस मौलाना जकरिया रहमतुल्लाह अलैहि ने अपने रिसाले फजाईले रमजान मुबारक मे लिखा है, खुदा की तरफ़ से अपने बंदों पर रमजान बहुत बड़ा इनाम है। इस महीने में खुद रोजा रखें, अहकामे खुदावन्दी पूरा-पूरा अदा करें। पांच वक्त की नमाज़ पढ़ने के साथ तिलावत कुरान करें जो सारे इंसानियत के लिए हिदायत है।
मदरसा ताज उल उलूम, रूआबांधा के प्रिंसिपल मुहम्मद शाहिद अली मिस्बाही कहते हैं , रमजान सिर्फ़ रोज़ा रखने का नाम नहीं, बल्कि रूह की पाकीजगी, सब्र का इम्तेहान और खिदमते खल्क का महीना है। यह महीना हमें अपने रब से जुड़ने, दिल को साफ़ करने और समाज के कमजोर तबकों के तंई जिम्मेदारी निभाने का पैगाम देता है।
रमज़ान का असल पैग़ाम सब्र है। दिन भर की भूख-प्यास इंसान को यह एहसास दिलाती है कि समाज में कितने लोग ऐसे हैं, जो रोज़ाना इसी हालात से गुजरते हैं। जब इंसान खुद भूखा रहता है तो उसे गरीब और जरूरतमंद लोगों का दर्द समझ में आता है। ये एहसास ही उसे दूसरों की मदद के लिए हौसला अफजाई करता है। इस महीने में जकात, सदका और फितरा देने की खास हिदायत है, ताकि समाज में माली तवाजुन बना रहे और कोई भी शख्स भूखा न सोए। रमज़ान रहमत और बरकत का महीना है। इस महीने में की गई इबादतों का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है।




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