मुल्क का कीमती सरमाया थे शमीम करहानी, हम उनकी कुर्बानियों को फरामोश कर बैठे : एमडब्ल्यू अंसारी

 जिल हज्ज, 1447 हिजरी 

   फरमाने रसूल      

जब तुम ऐसे हो जाओ के तुम्हारे गम बढ़ जाए, तुम उन गमों को खत्म करना चाहो तो मुझपर दरूद पढ़ो।

- जमाह तिर्मीज़ी 


भारत के मुमताज़ तरीन उर्दू ज़बान के शायर, मुशाएरों की कामयाबी के ज़ामिन शमीम करहानी की यौम-ए-पैदाइश पर पेश की ख़िराज-ए-अक़ीदत


Shamim Karhani, sayeed Khan


✅ बख्तावर अदब : भोपाल 

अनमोल सही, नायाब सही, बे-दाम-ओ-दिरम बिक जाते हैं,

बस प्यार हमारी क़ीमत है, मिल जाए तो हम बिक जाते हैं।

              सिक्कों की चमक पे गिरते हुए देखा है शेख़-ओ-ब्रहमन को,

                फिर मेरे खन्डर की क़ीमत क्या जब दैर-ओ-हरम बिक जाते हैं।

    भारत के मुमताज़तरीन उर्दू ज़बान के शायर, अपनी ग़ज़लगोई और दर्द अंगेज़ तरन्नुम की वजह से मुल्कगीर शोहरत के मालिक, सामईन के दिलदादा-ओ-पसंदीदा शायर, मुशाएरों की कामयाबी के ज़ामिन, हर दिल अजीज़ शमीम करहानी की यौम-ए-पैदाइश पर अंसार एजूकेशनल एंड वेलफेयर सोसाईटी की जानिब से अहले वतन की जानिब से उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत पेश की गई।

    शमीम करहानी की पैदाइश 8 जून 1913 को मौज़ा पारा ज़िला ग़ाज़ीपूर में हुई। उनका पैदाइशी नाम सय्यद शम्सुद्दीन हैदर था जबकि वो शमीम करहानी के नाम से मशहूर हुए। उनके वालिद भी शेअर-ओ-अदब के दिलदादा थे। ख़ानदान के कुछ बुज़ुर्ग बाक़ायदा शायरी करते थे, इसीलिए अदबी-ओ-शायराना माहौल में परवरिश हुई। उनकी वफात 19 मार्च 1975 में हुई।

    शमीम ने इब्तिदा-ए-शायरी में अपनी कुछ नज़्में और ग़ज़लें अल्लामा आरज़ू लखनवी को दिखाई लेकिन अल्लामा ने ये कह कर इस सिलसिले को मुनक़ते कर दिया कि उनकी फ़िक्र एक बहर-ए-रवां है, ये आप अपनी राह निकाल लेंगे।'

    अल्लामा आरज़ू लखनवी की ये पेशगोई सही साबित हुई और शमीम अपने दौर के नज़म-ओ-ग़ज़ल के मोतबर-ओ-मुस्तनद शायर तस्लीम किए जाने लगे।

    शमीम करहानी ने मौलवी, फ़ाज़िल, कामिल और मुंशी के इम्तेहान पास कर अलीगढ़ से इंटरमीडीयेट किया। कुछ अरसा आज़मगढ़ के डीएवी कॉलेज में उर्दू, फ़ारसी के मोअल्लिम के फ़राइज़ सरअंजाम दिए। 1950 में शुमाली हिंद की क़दीमतरीन-ओ-तारीख़साज़ तालीमी इदारे और दिल्ली के मशहूर एंग्लो अरेबिक स्कूल के तदरीसी अमले में शामिल हो गए और ता दम-ए-वफ़ात ईसी इदारे से वाबस्ता रहे।

    शमीम करहानी ने तरक़्क़ी-पसंद तहरीक से वाबस्तगी इख़तियार की। 1942 की अंग्रेज़ो भारत छोड़ो तहरीक के दौरान वो रोज़ाना एक बाग़ियाना नज़म लिख लेते थे। इस दौरान लिखी गईं उनकी नज़्में 'रोशन अंधेरा नाम के शेअरी मजमूआ में शाइआ हुई हैं। 1948 में जब महात्मा गांधी की शहादत का सानिहा पेश आया, उन्होंने तारीख़ में रक़म करने वाली नज़म तहरीर की 'जगाओ ना बापू को नींद में है,' ये नज़म अवाम के जज़बात को छू रही थी और उनके दिलों में तेज़ी से उतरती जा रही थी। जब पण्डित जवाहर लाल नेहरु ने ये नज़म सुनी तो वे बहुत मुतास्सिर हुए और लखनऊ में कांग्रेस के इंतिख़ाबी इजलास में इस नज़म को सुनाने की दरख़ास्त की।

    शमीम करहानी कई एवार्ड से सरफ़राज़ किए गए। 'अक्स-ए-गिलह्ण पर 1964 में उत्तरप्रदेश हुकूमत ने उन्हें एवार्ड से नवाज़ा। 'हरीफ़-ए-नीम-शब' पर 1972 में उत्तरप्रदेश उर्दू अकेडमी ने उन्हें एवार्ड अता किया। इसी तरह 1972 में ही उन्हें स्वरूप नारायण उर्दू नज़म और 'रंगाह्ण के गीत पर हकूमत-ए-हिन्द की जानिब से भी उन्हें एवार्ड से नवाज़ा गया। 

    शमीम करहानी ताउम्र उर्दू और उर्दू शायरी की ख़िदमत करते रहे। 1975 में ऐवान ग़ालिब के मुशायरे में शरीक हुए, कैफ़ी आज़मी से गले मिलते हुए अचानक उनकी तबीयत ख़राब हो गई। आनन-फा-आनन उन्हें क़रीब ही के एक अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड में ले जाया गया लेकिन वो ठीक नहीं हो सके। ज़िंदगी-भर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करने वाले उनके दिमाग़ की रग फट चुकी थी और यही उनकी मौत की वजह बनी। वो 19 मार्च का दिन था, जिसने उर्दू दुनिया से एक अज़ीम शायर को हमसे छीन लिया।

 (बहवाला : सोशल मीडीया, वीकी पीडिया व दीगर)


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