सरकारी स्कूलों को मदरसा न बनाए भाजपा सरकार : नासिर खोखर

शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आदेश में सरकारी स्कूलों में सुबह की प्राथना में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत के साथ ही  दीप मंत्र , सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, महापुरुषों की जीवनी का वाचन और मध्यान्ह भोजन में भोजन मंत्र और संध्या छुट्टी के समय राज्यगीत, गायत्री मंत्र, और शांति मंत्र का अनिवार्य वाचन का आदेश है



✅ बख्तावर अदब : दुर्ग 

    दुर्ग-भिलाई पालक संघ के अध्यक्ष नासिर खोखर ने छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के स्कूल शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आदेश का विरोध करते हुए कहा है कि भाजपा सरकार सरकारी स्कूलों को मदरसा बनाने का प्रयास कर रही है जो अनुचित है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आदेश में सरकारी स्कूलों में सुबह की प्राथना में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत के साथ ही  दीप मंत्र , सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, महापुरुषों की जीवनी का वाचन और मध्यान्ह भोजन में भोजन मंत्र और संध्या छुट्टी के समय राज्यगीत, गायत्री मंत्र, और शांति मंत्र का अनिवार्य वाचन का आदेश है। नासिर खोखर के मुताबिक ऐसे आदेशों को अनिवार्यत लागू कर सरकार स्कूलों को मदरसा के समकक्ष बना देगी। उन्होंने इस बात की आशंका जाहिर की कि इन सभी प्रक्रियाओं में 1 घंटे का वक्त लगेगा जिससे 4 घंटे की स्कूली शिक्षा 3 घंटे में सिमट जाएगी। 

    नासिर खोखर ने कहा कि शिक्षा के मूलत: तीन प्रकार मौलिक, नैतिक और धार्मिक शिक्षा है। और इन तीनों प्रकार की शिक्षा का उद्वेश्य और माध्यम अलग-अलग बिल्कुल अलग होता है। 

    उन्होंने कहा कि मौलिक शिक्षा से तात्पर्य उस बुनियादी, प्रारंभिक और अनिवार्य शिक्षा से है, जो किसी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, साक्षरता और जीवन कौशल के लिए आवश्यक होती है। इसके तहत व्यक्ति को पढ़ना-लिखना, बुनियादी गणित और नैतिक-सामाजिक मूल्यों का ज्ञान दिया जाता है, ताकि वह एक जिम्मेदार नागरिक बन सके। 

    इसी तरह नैतिक शिक्षा का अर्थ व्यक्ति में मानवीय मूल्यों, सदाचार और सही-गलत की समझ विकसित करना है। यह एक ऐसी शिक्षा प्रणाली है जो केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर, व्यक्ति के चरित्र निर्माण, भावनात्मक विकास और समाज में एक जिम्मेदार, संवेदनशील व ईमानदार नागरिक बनाने में मदद करती है। जबकि धार्मिक शिक्षा का अर्थ विभिन्न धर्मों, उनकी मान्यताओं, नैतिक मूल्यों, और आध्यात्मिक परंपराओं का व्यवस्थित अध्ययन है जो छात्रों में सहिष्णुता, सामाजिक समरसता और जीवन के गहरे उद्देश्यों को समझने की क्षमता विकसित करती है, जिससे वे एक विविध और समावेशी समाज का हिस्सा बन सकें।

     नासिर ने कहा कि तीनों शिक्षा का उद्देश्य और शिक्षा का माध्यम अलग है, स्कूलों में धार्मिक शिक्षा को अनिवार्य लागू करना, स्कूलों को मदरसा की श्रेणी में ला देगा। जिस तरह मदरसों में धार्मिक शिक्षा का समावेश कर शिक्षा दी जाती है। धर्म की शिक्षा के लिए सरकार स्कूलों से अलग अन्य माध्यम बनाए।

    उन्होंने शिक्षा मंत्री और शिक्षा विभाग से स्कूलों को धार्मिक शिक्षा का केंद्र बनाने की बजाए मौलिक शिक्षा का केंद्र बनाने की मांग करते हुए जारी आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग की है। अन्यथा की स्थिति में उन्होंने भाजपा सरकार और शिक्षा मंत्रालय के शिक्षा के धार्मिक विकेंद्रीकरण के प्रयास के खिलाफ आंदोलन करने की चेतावनी देते हुए पालकों के हित में न्यायालय की शरण में जाने की बात कही है। 


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