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रमजान उल मुबारक, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जिस शख्स का मकसद आखेरात की बेहतरी हो, अल्लाह ताअला उसके दिल को गनी कर देता है, उसके बिखरे हुए कामों को समेट देता है और दुनिया ज़लील हो कर उसके पास आती हैं।
- तिर्मीज़ी शरीफ
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✅ बख्तावर अदब : भोपाल
रमज़ान उल-मुबारक का महीना आते ही मुआशरे का मंज़र बदल जाता है। सह्र-ओ-इफ़तार की रौनक़ें, मसाजिद की आबादियां और तिलावत-ए-क़ुरआन की सदाएँ, ये सब रूहानियत का एहसास दिलाते हैं। मगर एक बुनियादी सवाल हमसे तक़ाज़ा करता है कि क्या रोज़ा सिर्फ़ भूख और प्यास बर्दाश्त करने का नाम है, अगर रोज़ा महज भूखा-प्यासा रहने का नाम होता तो अल्लाह ताअला उसे इबादत का इतना बुलंद दर्जा ना देता।
रोज़ा दरअसल इन्सान के नफ़स की तर्बीयत, किरदार साज़ी और मुआशरती मुसावात का अमली दरस है। रोज़ा इन्सान को सबसे पहले उसके अपने नफ़स से मुतआरिफ़ कराता है। भूख और प्यास की शिद्दत इन्सान को उसकी कमज़ोरी का एहसास दिलाती है। वो समझता है कि वो कितना मुहताज है, कितना बेबस है। यही एहसास तकब्बुर को तोड़ता है।
रोज़ादार जब पानी का एक घूँट भी अल्लाह के हुक्म से रोके रखता है तो वो दरअसल अपनी ख़ाहिशात को क़ाबू में लाने की मश्क़ कर रहा होता है। यही मश्क़ बाद में ग़ुस्से पर क़ाबू, ज़बान की हिफ़ाज़त, निगाह की पाकीज़गी और दिल की सफ़ाई की सूरत में ज़ाहिर होती है और होनी चाहिए। अगर रोज़ा हमें झूट, ग़ीबत, धोखा और नफ़रत से नहीं रोकता तो हमें अपने रोज़े की रूह पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।
दूसरा अहम पहलू मुआशरती मुसावात का है। रोज़ा अमीर और ग़रीब के दरमयान फ़ासले कम करता है। वो शख़्स, जो सारा साल नेअमतों में रहता है, जब भूख की शिद्दत महसूस करता है तो उसे पहली बार एहसास होता है कि फ़ाक़ा ज़दा लोगों की ज़िंदगी कैसी होती होगी। ये एहसास महिज़ हमदर्दी नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी पैदा करता है। इसीलिए रमज़ान में ज़कात, सदक़ात और ख़ैरात की ताकीद की गई है।
इस्लाम ऐसा मुआशरा चाहता है, जहां कोई भूखा ना सोए, जहां दौलत चंद हाथों में क़ैद ना हो बल्कि गर्दिश में रहे। मगर अफ़सोस ये कि हमने रोज़े को वो मुक़ाम नहीं दिया। दिन-भर ग़ुस्सा, सख़्त कलामी, कारोबारी धोखा और शाम को पुर तकल्लुफ दस्तरख़्वान। ये रमज़ान वो रमज़ान नहीं जो नबी करीम ﷺ ने हमें दिया। असल रमज़ान वो है, जो इन्सान को नर्म-दिल बनाए, दूसरों का दर्द महसूस करना सिखाए और मआशरे में इन्साफ़, हमदर्दी और बराबरी को फ़रोग़ दे।
रोज़ा हमें ये भी सिखाता है कि इन्सान की असल क़दर उसकी दौलत, लिबास या हैसियत से नहीं बल्कि तक़्वा से है। इफ़तार के वक़्त सब एक जैसे होते हैं, कोई बादशाह नहीं, कोई फ़क़ीर नहीं, सब अल्लाह के मुहताज बंदे हैं। यही पैग़ाम अगर हम सालभर ज़िंदा रखें तो नफ़रतें कम हो सकती हैं, तबक़ाती तक़सीम घट सकती है और मुहब्बत-ओ-उखुवत का माहौल पैदा हो सकता है।
आज के दौर में जब मुआशरा ख़ुदग़रज़ी, नफ़रत अंगेज़ी और अदम बर्दाश्त का शिकार है, रमज़ान का पैग़ाम और भी अहम हो जाता है। हमें अपने रोज़े को सिर्फ इबादत नहीं बल्कि किरदार की तामीर की तहरीक बनाना होगा। ऐसा रमज़ान, जो हमें बेहतर इन्सान, ज़िम्मेदार शहरी और दर्दमंद मुस्लमान बनाए, यही असल कामयाबी है।
रोज़ा दरअसल इन्सान के नफ़स की तर्बीयत, किरदार साज़ी और मुआशरती मुसावात का अमली दरस है। रोज़ा इन्सान को सबसे पहले उसके अपने नफ़स से मुतआरिफ़ कराता है। भूख और प्यास की शिद्दत इन्सान को उसकी कमज़ोरी का एहसास दिलाती है। वो समझता है कि वो कितना मुहताज है, कितना बेबस है। यही एहसास तकब्बुर को तोड़ता है।
रोज़ादार जब पानी का एक घूँट भी अल्लाह के हुक्म से रोके रखता है तो वो दरअसल अपनी ख़ाहिशात को क़ाबू में लाने की मश्क़ कर रहा होता है। यही मश्क़ बाद में ग़ुस्से पर क़ाबू, ज़बान की हिफ़ाज़त, निगाह की पाकीज़गी और दिल की सफ़ाई की सूरत में ज़ाहिर होती है और होनी चाहिए। अगर रोज़ा हमें झूट, ग़ीबत, धोखा और नफ़रत से नहीं रोकता तो हमें अपने रोज़े की रूह पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।
दूसरा अहम पहलू मुआशरती मुसावात का है। रोज़ा अमीर और ग़रीब के दरमयान फ़ासले कम करता है। वो शख़्स, जो सारा साल नेअमतों में रहता है, जब भूख की शिद्दत महसूस करता है तो उसे पहली बार एहसास होता है कि फ़ाक़ा ज़दा लोगों की ज़िंदगी कैसी होती होगी। ये एहसास महिज़ हमदर्दी नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी पैदा करता है। इसीलिए रमज़ान में ज़कात, सदक़ात और ख़ैरात की ताकीद की गई है।
इस्लाम ऐसा मुआशरा चाहता है, जहां कोई भूखा ना सोए, जहां दौलत चंद हाथों में क़ैद ना हो बल्कि गर्दिश में रहे। मगर अफ़सोस ये कि हमने रोज़े को वो मुक़ाम नहीं दिया। दिन-भर ग़ुस्सा, सख़्त कलामी, कारोबारी धोखा और शाम को पुर तकल्लुफ दस्तरख़्वान। ये रमज़ान वो रमज़ान नहीं जो नबी करीम ﷺ ने हमें दिया। असल रमज़ान वो है, जो इन्सान को नर्म-दिल बनाए, दूसरों का दर्द महसूस करना सिखाए और मआशरे में इन्साफ़, हमदर्दी और बराबरी को फ़रोग़ दे।
रोज़ा हमें ये भी सिखाता है कि इन्सान की असल क़दर उसकी दौलत, लिबास या हैसियत से नहीं बल्कि तक़्वा से है। इफ़तार के वक़्त सब एक जैसे होते हैं, कोई बादशाह नहीं, कोई फ़क़ीर नहीं, सब अल्लाह के मुहताज बंदे हैं। यही पैग़ाम अगर हम सालभर ज़िंदा रखें तो नफ़रतें कम हो सकती हैं, तबक़ाती तक़सीम घट सकती है और मुहब्बत-ओ-उखुवत का माहौल पैदा हो सकता है।
आज के दौर में जब मुआशरा ख़ुदग़रज़ी, नफ़रत अंगेज़ी और अदम बर्दाश्त का शिकार है, रमज़ान का पैग़ाम और भी अहम हो जाता है। हमें अपने रोज़े को सिर्फ इबादत नहीं बल्कि किरदार की तामीर की तहरीक बनाना होगा। ऐसा रमज़ान, जो हमें बेहतर इन्सान, ज़िम्मेदार शहरी और दर्दमंद मुस्लमान बनाए, यही असल कामयाबी है।
- पेशकश :
बेनज़ीर अंसार एजुकेशनल एंड सोशल वेल्फेयर सोसाइटी
उसेआ रिसोर्ट, क्वींस होम
अहमदाबाद पैलेस, भोपाल

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