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रमजान उल मुबारक, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जो आदमी इस हाल में फौत हुआ के वह अल्लाह ताअला और आख़ेरत पर इमान रखता हो तो उससे कहा जाएगा, जन्नत के आठ दरवाज़ों में से जिस दरवाज़े से दाखिल होना चाहता है, दाखिल हो जा।
- मसनद अहमद
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रमजानुल मुबारक का दूसरा अशरा, इबादत-ओ-रियाजत के साथ
इस्लाही प्रोग्राम जारी
मर्कजी मस्जिद, पावर हाउस, कैंप-2 में जकात को लेकर वर्कशॉप मुनाकिद
रमजान उल मुबारक के महीने में मर्कजी मस्जिद, पावर हाउस, कैंप-2 में जकात को लेकर एक वर्कशॉप मुनाकिद की गई जहां दारुल कजा के शहर काजी, मुफ्ती मोहम्मद सोहेल ने अवाम को जकात के हुक्म और पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वस्सलम के नूरानी तरीका-ए-कार की जानकारी दी।
प्रोग्राम से खिताब करते हुए मुफ्ती सोहेल ने कहा, हर साहिबे निसाब बालिग, आकिल और मोमिन मर्द-ओ-औरत को जकात देना फ़र्ज़ है। उन्होंने कहा कि जिनके पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी हो या इनमें से किसी एक की रकम के बराबर नगद मौजूद हो, उसे जकात निकालना लाजिम है। इसी तरह सालाना कारोबार के बाद आज के दौर में साढ़े बावन तोला चांदी की कीमत के बराबर की रकम हो, जिस पर साल गुजर गया हो, तो भी उसमें 2.5 फीसद जकात अदा करनी होगी।
उन्होंने बताया कि जकात माल, सोना, चांदी, जानवर, फ़सल और मौजूदा दौर में कारोबार रियल एस्टेट, वो मकान जिससे किराया आता हो, वो जमीन जिसे (प्लॉट) मुनाफे के इरादे के लिए खरीद रखा है, उसकी मूल कीमत का 2.5 फीसदी निकालनी चाहिए। जकात किसी फकीर, मुसाफिर, कर्जदार, यतीम, बेवा, मिस्कीन को दी जा सकती है।
यहां ये ध्यान रखने की बात है कि सैय्यद परिवार, जो हजरत मोहम्मद 000 के खानदान से हो, हाशमी खानदान, सगे मां-बाप, बेटा-बेटी, दादा-दादी और नाना-नानी को जकात नहीं दी जाकती। इनकी मदद जकात के अलावा दीगर माल या रकम देकर की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जकात और सदका दर हकीकत अल्लाह की तरफ से एक बेहतरीन निजाम है जो रसूलों ओर नबियों के जरिए इंसानियत का बेहतरीन मआशरा बनाने में अहम किरदार अदा करता है। मुफ्ती सोहेल ने कहा, अल्लाह को तुम्हारे माल की कोई जरूरत नहीं वो तो तकवा देखता है।

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