रमज़ान मुबारक : क़ुर्बानी, तर्बियत और रहमत का महीना, क्या है इसकी अहमियत

 रमज़ानुल मुबारक, 1447 हिजरी 

     फरमाने रसूल       

बेहतर दोस्त अल्लाह के नज़दीक वो है, जो अपने दोस्तों में बेहतर हो और बेहतरीन पड़ोसी वो है जो अपने पड़ोसियों के हक़ में बेहतर हो। 

- तिर्मिज़ी

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✅ नुजहत सुहेल पाशा : रायपुर 

    रमज़ान मुबारक मुसलमानों के लिए बेहद पाक, बरकतों और अज़मत वाला महीना है। यह सिर्फ इबादत का नहीं बल्कि इंसान की रूहानी, अख़लाक़ी और सामाजिक तरबियत का पूरा निज़ाम है। इसी महीने में अल्लाह तआला ने इंसानियत की हिदायत के लिए क़ुरआन मजीद नाज़िल फ़रमाया, जिसने ज़िंदगी गुज़ारने का सही रास्ता बताया।
अल्लाह तआला क़ुरआन करीम में फरमाता है:
शहरू रमज़ान अल्लज़ी उन्ज़िला फ़ीहिल क़ुरआनुङ्घ 
(सूरह अल-बक़रह : 185)
( तर्जुमा : रमज़ान वो महीना है, जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो लोगों के लिए रहनुमाई है और हिदायत की वाजेह निशानियाँ और हक व बातिल में फर्क करने वाला है। इसलिए तुममें से जो इस महीने को पाए, वह रोज़ा रखे।)
    इसी अज़ीम नेअमत के बदले अल्लाह तआला ने पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमाह पर रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ किए। रोज़ा, दरअसल सब्र और अल्लाह की ख़ुशनूदी हासिल करने का एक जरिया है। 

रोज़े का असल मफहूम 

    रोज़े के लफ्जी माने है, किसी चीज़ से रुक जाना या खुद को रोक लेना। लेकिन रोज़ा सिर्फ खाने-पीने से रुकने का नाम नहीं है। रोज़ेदार को झूठ, धोखा, फरेब, बुरी ज़ुबान और हर तरह की बुराई से भी बचना होता है। यानी इंसान अपनी ख्वाहिशों को काबू में करना सीखता है। 
यह हकीकत में अपने नफ़्स पर काबू पाने का इम्तेहान है। इंसान और दीगर जीवों के बीच असली फर्क यही है कि इंसान अपनी खवाहिशों को काबू में कर सकता है। रोज़ा इंसान को अपने जज्बात और रवैये को मुतवाजिन रखना सिखाता है।

अख्लाकी तर्बियत का महीना

    रमज़ान साल में इसलिए आता है ताकि इंसान अपने अख्लाकी इकदार को मज़बूत कर सके। यह एक तर्बियत का महीना है जो इंसान में सब्र, रवादारी, इसार हमदर्दी और क़ुर्बानी जैसी खूबियाँ पैदा करता है। रोज़ा हमें सिखाता है कि एक अच्छा इंसान कैसे बना जाता है।

सामाजिक जज्बा और हमदर्दी

    भूख और प्यास सहने से इंसान को गरीब, ज़रूरतमंद और भूखे लोगों की तकलीफ़ का एहसास होता है। रमज़ान हमें सिर्फ इबादत ही नहीं बल्कि समाज के कमज़ोर लोगों का ख़याल रखने की भी ताअलीम देता है। सदक़ा और ख़ैरात का जज़्बा इसी महीने में ज्यादा होता है ताकि समाज में इंसानियत के रिश्ते मज़बूत हों।

सेहत से मुताल्लिक फायदे

    रोज़े के तिब्बी फवायद भी हैं। तहकीक के मुताबिक भूखा रहने की हालत में जिस्म की नुकसानदेह कोशिकाएँ धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं और नई, सेहमतंद कोशिकाएँ परवान चढ़ती हैं। इस तरह जिस्म को कुदरती तौर पर साफ करने और नए सिरे से उसकी ताअमीर का मौका मिलता है। 

रमज़ान का हकीकी पैगाम

    रमज़ान महज भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं बल्कि खुद की अक्कसारी, बेहतरी और भाईचारगी का पैगाम देता है। यह महीना हमें सिखाता है कि हम अपने रिश्तों को मज़बूत करें, एक-दूसरे के लिए आसानी पैदा करें और कुर्बानी व खिदमात के जज्बों को बढ़ाएं। 
    गर हम रमज़ान के हकीकी पैगाम को समझ लें तो ये महीना हमें बेहतर इंसान बनाने की पूरी तर्बियत देता है।
 
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