सर सय्यद अहमद ख़ान का तालीमी मिशन और आज के मुस्लमान

 रबि उल आख़िर, 1448 हिजरी

﷽

   फरमाने रसूल    ﷺ 

रात का खाना तर्क न करो। कुछ न मिले तो एक मुट्ठी खजूर ही खा लिया करो, क्योंकि रात को खाना छोड़ देने से जल्द बुढ़ापा आ जाता है।

(इब्ने माजा)

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ख़राज-ए-अक़ीदत से आगे बढ़कर सर सय्यद के ख्वाबों की तकमील का वक़्त 

 ✅एमडब्ल्यू अंसारी : भोपाल

    17 अक्तूबर हमें एक ऐसी शख़्सियत की याद दिलाता है, जिसने अपने ज़माने के मुश्किल हालात में तालीम, समाजी इस्लाह और फ़िक्री बेदारी को अपनी जद्द-ओ-जहद का मर्कज़ बनाया। वो श्ख्सियत है, सर सय्यद अहमद खां, जिनकी ज़िंदगी का मुताला करने पर मालूम होता है कि वे महज एक तालीमी इदारे के बानी नहीं थे, बल्कि एक ऐसे मुसल्लेह थे, जो क़ौम को बदलते हुए ज़माने के तक़ाज़ों से हम-आहंग देखना चाहते थे। उनका मक़सद सिर्फ तालीम याफ़ता अफ़राद पैदा करना नहीं, बल्कि एक बा शऊर, बा सलाहीयत और तरक़्क़ी-पसंद मुआशरे की तामीर भी था।

    जंग-ए-आज़ादी के बाद भारतीय मुस्लमानों को शदीद सियासी, मआशी और तालीमी मुश्किलात का सामना था। सर सय्यद ने हालात का मातम करने और माज़ी की अज़मत पर इकतिफ़ा करने की बजाय मुस्तक़बिल की तामीर का रास्ता इख़तियार किया। उन्होंने महसूस किया कि जदीद उलूम, अंग्रेज़ी ज़बान, साईंस और तहक़ीक़ से दूर रह कर नई दुनिया के तक़ाज़ों का मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। इसी सोच के तहत उन्होंने तालीमी इदारे क़ायम किए, साइंटिफिक सोसाइटी के ज़रीये जदीद उलूम को भारतीय ज़बानों में मुंतक़िल करने की कोशिश की और रिसाला ''तहज़ीब उल-ईख़लाक़' जारी किया। अलीगढ़ में महमडन ऐंगलो ओरीएंटल कॉलेज क़ायम हुआ, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी बना। ये महज एक इदारे की तरक़्क़ी की दास्तान नहीं, बल्कि एक फ़िक्र, एक तहरीक और एक इजतिमाई बेदारी की तारीख़ है। 

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    सर सय्यद का विजन था कि मुस्लमान जदीद तालीम और साईंसी उलूम में आगे बढ़ें, अपनी तहज़ीबी शनाख़्त से वाबस्ता रहें और मुल्क-ओ-समाज की तरक़्क़ी में मूसिर किरदार अदा करें। उनकी फ़िक्र का एक अहम पहलू ये भी था कि तालीम के साथ समाजी इस्लाह और अख़लाक़ी तर्बीयत ज़रूरी है। तहज़ीब उल-ईख़लाक़ के ज़रीये उन्होंने मुआशरे में फैली ख़ामीयों, फ़र्सूदा रवी्यों और फ़िक्री जुमूद पर गुफ़्तगु की। वे जानते थे कि क़ौमों की तरक़्क़ी सिर्फ़ तालीमी अस्नाद से नहीं होती, बल्कि उसके लिए सोच में तबदीली, किरदार की मज़बूती और अमल का जज़बा भी ज़रूरी है।

    यौम सर सय्यद मनाते हुए हम तमाम अलीगस को ये सवाल ख़ुद से ज़रूर करना चाहिए कि हमने उनके मिशन को किस हद तक अपनी अमली ज़िंदगी का हिस्सा बनाया है। क्या हमने तालीम को वाक़ई अपनी अव्वलीन तर्जीह बनाया है, क्या हमारे मुआशरे का ग़रीब बच्चा भी मयारी तालीम हासिल करने का ख़ाब देख सकता है; क्या हमने अपनी नई नसल को साईंस, टैक्नोलोजी, तहक़ीक़ और रोज़गार के बदलते मवाक़े के लिए तैयार किया है; और क्या हमारे तालीमी इदारे सिर्फ़ इमतिहान पास कराने और अस्नाद देने तक महिदूद हैं, या वो बच्चों में सवाल करने, सोचने, तहक़ीक़ करने और मुआशरे के लिए कुछ करने का जज़बा भी पैदा कर रहे हैं; या फिर हम सब साल में एक दिन बस जश्न मनाने के लिए जमा हो जाते हैं। 

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 ये सवालात किसी एक तबक़े या इदारे के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि हमारी इजतिमाई ज़िम्मेदारी की याद-दहानी हैं। सर सय्यद का मिशन मायूसी के बजाय अमल, शिकायत के बजाय मंसूबा बंदी और इन्फ़िरादी कामयाबी के बजाय इजतिमाई तरक़्क़ी की तरफ़ बुलाता है।

    तालीम के मैदान में आज सबसे अहम ज़रूरत उन बच्चों और ख़ानदानों की मदद है, जो मआशी मुश्किलात के बाइस तालीम से महरूम रह जाते हैं। किसी ग़रीब तालिब-इल्म की फ़ीस अदा करना, किसी होनहार बच्चे को स्कालरशिप देना, किसी स्कूल में मयारी तदरीस का इंतिज़ाम करना, लाइब्रेरी क़ायम करना या नौजवानों को मसाकती इमतिहानात और रोज़गार के लिए रहनुमाई फ़राहम करना बज़ाहिर छोटे इक़दामात हैं, लेकिन यही काम बड़े समाजी नताइज पैदा कर सकते हैं। ज़रूरत इस बात की है कि अहल-ए-ख़ैर, तालीमी इदारे, समाजी तंज़ीमें और बासलाहीयत अफ़राद अपनी ज़िम्मेदारी को समझें और मुनज़्ज़म अंदाज़ में आगे आएं।

    ज़बान-ओ-सक़ाफ़्त के मैदान में भी चैलेंजिज़ कम नहीं हैं। उर्दू, अरबी और फ़ारसी जैसी ज़बानों के फ़रोग़ और तदरीस से वाबस्ता बाअज़ इदारों को माली वसाइल, असातिज़ा की कमी और बदलते तालीमी हालात जैसे मसाइल का सामना है। बाअज़ मुक़ामात पर तदरीसी सरगर्मीयां महिदूद हुई हैं और कहीं इदारों के मुस्तक़बिल पर सवालात उठ रहे हैं। इस सूरत-ए-हाल का दरुस्त अंदाज़ा लगाने के लिए रियासत और इदारे के लिहाज़ से मुस्तनद आदाद-ओ-शुमार, असातिज़ा की मंज़ूर शूदा और ख़ाली आसामीयों और बंद या ग़ैर फ़आल इदारों की तफ़सीलात सामने लाना ज़रूरी है। ताहम ये हक़ीक़त अपनी जगह अहम है कि ज़बानों और तहज़ीबी विरसे की हिफ़ाज़त सिर्फ़ जज़बाती नारों से नहीं हो सकती; इसके लिए तदरीस, तहक़ीक़, किताबों की इशाअत, तर्जुमे और नई नसल की अमली दिलचस्पी को फ़रोग़ देना होगा।

    उर्दू इस मुल्क की मुशतर्का तहज़ीब, अदब, सहाफ़त और तहरीक आज़ादी की एक अहम ज़बान है। अरबी और फ़ारसी ने भी हमारे इलमी, अदबी और तारीख़ी सरमाए को तशकील देने में नुमायां किरदार अदा किया है। इन ज़बानों की हिफ़ाज़त का मतलब किसी दूसरी ज़बान की मुख़ालिफ़त नहीं, बल्कि अपने इलमी विरसे को महफ़ूज़ रखते हुए नई नसल के लिए इलम के मज़ीद दरवाज़े खोलना है। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी और दीगर भारतीय ज़बानों के दरमयान राबिता और एहतिराम का माहौल हमारे समाज को मज़ीद मज़बूत बना सकता है। यही वो तहज़ीबी रवैय्या है, जिसमें इख़तिलाफ़ के बावजूद एहतिराम और तनव्वो के बावजूद इत्तिहाद को एहमीयत दी जाती है।

    सर सय्यद के मिशन की माअनवियत उसी वक़्त मुकम्मल होती है, जब तालीम के साथ समाजी इन्साफ़, बाहमी एहतिराम और महरूम तबक़ात की तरक़्क़ी को भी एहमीयत दी जाए। मज़हब, ज़बान, ज़ात या मआशी हैसियत की बुनियाद पर किसी बच्चे के तालीमी मुस्तक़बिल को महिदूद नहीं होना चाहिए। मुआशरे की हक़ीक़ी तरक़्क़ी उस वक़्त होती है, जब कमज़ोर से कमज़ोर फ़र्द को भी आगे बढ़ने का मौक़ा मिले और तालीम लोगों के दरमयान फ़ासले बढ़ाने के बजाय उन्हें एक दूसरे के क़रीब लाए।

    आज हमें सर सय्यद के नाम पर मुनाक़िद होने वाली तक़रीबात को अमली अह्द में बदलने की ज़रूरत है। हर तालीमी इदारा मुस्तहिक़ बच्चों की मदद का मन्सूबा बनाए, अहल-ए-ख़ैर मुस्तक़िल तालीमी वज़ाइफ़ के लिए आगे आएं, समाजी तंज़ीमें तालीमी जरूरतों की तसदीक़ के साथ मदद फ़राहम करें और नौजवानों को जदीद उलूम के साथ अपनी ज़बान, तारीख़ और तहज़ीबी विरसे से भी जोड़ा जाए। ये काम किसी एक तंज़ीम, जमात या फ़र्द के बस नहीं; इसके लिए इजतिमाई तआवुन और मुसलसल मेहनत दरकार है।

    सर सय्यद को ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने का असल मतलब उनके ख़ाबों की तकमील के लिए अपनी ज़िम्मेदारी अदा करना है। सवाल ये नहीं कि हम हर साल सर सय्यद डे किस शान से मनाते हैं, सवाल ये है कि हमारे मुआशरे में कितने बच्चों को तालीम मिली, कितने नौजवानों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिला और हमने अपने इलमी-ओ-तहज़ीबी विरसे की हिफ़ाज़त के लिए क्या अमली काम किया। यही सवाल हमारे लिए रहनुमाई भी है और ख़ुद के अंदर झाँकने का पैमाना भी।




- आईपीएस, रिटा डीजीपी छत्तीसगढ़


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