जंग-ए-बद्र : मिल्लत-ए-इस्लामिया की तदबीर और दावत-ए-हक़ के मुस्तक़बिल के फैसले की जंग

रमदान अल मुबारक, 1446 हिजरी 


   फरमाने रसूल ﷺ   

 "रसुल अल्लाह ﷺ ने एक शख्स को सूरह अखलास पढ़ते हुए सुना तो फरमाया, इसके लिए जन्नत वाजिब हो गई।"
- जमाह तिर्मिज़ी 

✅ नुजहत सुहेल पाशा : रायपुर 

    17 रमज़ान उल मुबारक, सन 2 हिजरी में मदीना मुनव्वरा से 80 मील के फ़ासले पर वाक़े बद्र नामी मक़ाम पर हुई ये जंग मुसलमानों और क़ुरैश-ए-मक्का के दरमियान पहली जंग है जिसके बाद से अब तक मुसलमानों को जितनी फ़तूहात नसीब हुईं, वह सब इसी "फ़तह-ए-मुबीन" की मरहून-ए-मिन्नत थी, जो बद्र के मैदान में इस मुठ्ठी भर जमाअत को हासिल हुई।


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    हज़ूर नबी करीम ﷺ ने सहाबा किराम के हम राह जब मदीना हिजरत फ़रमाई तो क़ुरैश ने हिजरत के साथ ही मदीना मुनव्वरा पर हमले की तैयारियां शुरू कर दी थीं। हिजरत के महज़ दो साल बाद ही उन्होंने मदीना की चरागाह पर हमला किया और लूटमार कर फ़रार हो गए।
    इसी अस्ना में नबी करीम ﷺ को क़ुरैश के तिजारती क़ाफ़िले की ख़बर मिली जो शाम से वापस आ रहा था। आप ﷺ अपने असहाब के साथ इस तिजारती क़ाफ़िले को तलाश करने निकले, जंग का कोई इरादा नहीं था लेकिन क़ुरैश इस ख़बर को सुनते ही अपने क़ाफ़िले की हिफ़ाज़त के लिए उमड़ पड़े और यूं मुसलमानों पर जंग मुसल्लत कर दी गई।
    तारीख़ी रिवायात के मुताबिक़ मुसलमानों की कुल तादाद तीन सौ तेरह थी और साज़-ओ-सामान में 60 ऊंट, 60 ज़िरहें और चंद तलवारें थीं। जबकि दुश्मन की तादाद एक हज़ार नफूस पर मुश्तमिल थी और वह हर तरह से लैस थी। उनके पास 700 ज़िरहें, 70 घोड़े, लातादाद ऊंट, बेशुमार तलवारें और नेज़े थे। इसके बावजूद दुनियावी साज़-ओ-सामान की क़िल्लत के बावजूद मुसलमानों ने एक ही दिन में मआरिका जीत लिया। काफ़िरों के नामवर 70 सरदार मारे गए और इतने ही गिरफ़्तार हुए।
    ग़ज़वा-ए-बद्र वह तारीख़साज़ और फ़ैसलाकुन लड़ाई थी, जिसमें मिल्लत-ए-इस्लामिया की तदबीर और दावत-ए-हक़ के मुस्तक़बिल का फ़ैसला हुआ। इसके बाद से अब तक मुसलमानों को जितनी फ़तूहात नसीब हुईं वह सब इसी "फ़तह-ए-मुबीन" की मरहून-ए-मिन्नत थीं जो बद्र के मैदान में इस मुठ्ठी भर जमाअत को हासिल हुई।
    अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने क़ुरआन मजीद में इसे "यौमुल फ़ुरक़ान" हक़ व बातिल में फ़र्क़ का दिन क़रार दिया है। इस जंग में मुसलमानों की फ़तह ने वाज़ेह कर दिया कि इस्लाम हक़ है और हक़ फ़तहयाब होता है, कुफ़्र व शिर्क बातिल है और बातिल मिट जाने वाला है। इस फ़ैसला कुन फ़तह ने इस्लाम और मुसलमानों को अरब में एक ताक़त के तौर पर मुतआर्रिफ़ करवाया और इस जंग के बहुत ही दूररस और देरपा असरात मुरत्तब हुए, जिसने इस्लामी रियासत के क़याम में बुनियादी किरदार अदा किया।

क़ुरआनी हवाला :

अल्लाह तआला ने सूरह अल-अंफाल (आयत 41) में ग़ज़वा-ए-बद्र को "यौमुल फ़ुरक़ान" यानी हक़ व बातिल के दरमियान फ़ैसला करने वाला दिन क़रार दिया।
    "और अगर तुम अल्लाह और उस चीज़ पर ईमान लाए हो जो हमने अपने बंदे पर फ़ैसले के दिन (यौमुल फ़ुरक़ान) नाज़िल की, जिस दिन दोनों जमाअतें आपस में टकरा गईं, तो जान लो कि जो कुछ भी तुमने माल-ए-ग़नीमत हासिल किया है, उसका पांचवां हिस्सा अल्लाह, रसूल, क़ुरबतदारों, यतीमों, मिस्कीनों और मुसाफ़िरों के लिए है।" (सूरह अल-अंफाल: 41)

अहम निकात :

✅ यह पहला ग़ज़वा था, जिसमें अल्लाह ने फ़रिश्तों के ज़रिए मुसलमानों की मदद फ़रमाई।
✅ फ़तह-ए-बद्र के नतीजे में इस्लाम एक मज़बूत कूव्वत बनकर उभरा।
✅ यह जंग हक़ व बातिल के दरमियान पहला बड़ा इम्तेहान थी, जिसमें मुसलमानों ने सब्र, ईमानी क़ुव्वत और तवक्कुल अल अल्लाह की मिसाल क़ायम की।
यह वाक़िआ आज भी हमें सिखाता है कि ईमान, इस्तिक़ामत और अल्लाह पर भरोसा कामयाबी की कुंजी हैं, चाहे हालात कितने ही नामुसाइद क्यों न हों।



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