रज्जब उल मुरज्जब, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
आलाह ताअला फरमाता है,:ऐ
इंसान! मेरी इबादत के लिये फारिग हो जा,
मैं तेरे दिल को मालदारी (कनाअत) से भर दूंगा, तेरी मोहताजी खत्म कर दूंगा, और अगर तू ऐसा नहीं करेगा तो मैं ऐसे
कामों में मसरूफ कर दूंगा जो तेरे मुकद्दर में नहीं और
तेरी मोहताजी खत्म नही करुँगा।*
- सुनन इब्न माजह
मस्जिद महज़ सज्दे की जगह नहीं, बल्कि ईमान की तर्बीयतगाह, अख़लाक़ की दरसगाह और मुआशरती इस्लाह का मर्कज़ है। मस्जिद की रूह इमाम और मोअज्जन से वाबस्ता होती है। अगर यही रूह मआशी दबाव, बेक़दरी और अदम तहफ़्फ़ुज़ का शिकार हो जाए तो मस्जिद सिर्फ एक इमारत बन कर रह जाती है।
आज एक अर्से से ये सवाल हमारे ज़मीर को झिंझोड़ रहा है कि क्या हमने वाक़ई अपने इमाम और मोअज्ज़न की इज़्ज़त, वक़ार और जरूरतों को समझा है, क्या हमने उन्हें वो मुक़ाम दिया है, जिसके वो अख़लाक़न और समाजन हक़दार हैं।
ये बात वाजेह रहनी चाहिए कि इमाम और मोअज्ज़न किसी मस्जिद के मुलाज़िम और नौकर नहीं बल्कि क़ौम के मज़हबी रहनुमा और रहबर होते हैं। उनकी बेक़दरी दरअसल दीन की बेक़दरी है। यही वो नुक्ता है जिसकी तरफ़ एमडब्ल्यू अंसारी, आईपीएस और उनकी सोसाइटी पिछले दो सालों से मुसलसल तवज्जा दिला रही है। उन्होंने बारहा इस बात पर ज़ोर दिया है कि इमाम-ओ- मोअज्ज़न को हर तरह से मज़बूत बनाया जाए ताकि वो मआशी फ़िक्र से आज़ाद होकर दीन के काम के लिए ख़ुद को वक़्फ़ कर सकें।
बदक़िस्मती से आज भी अक्सर मसाजिद में इमाम-ओ- मोअज्ज़न की तनख़्वाहें इस महंगाई के दौर में नाकाफ़ी ही नहीं बल्कि इंतिहाई कम है। एक ऐसा इमाम जो किराया, बच्चों की तालीम, ईलाज और घर के अख़राजात की फ़िक्र में मुबतला हो, वो क़ौम की फ़िक्री-ओ-अख़लाक़ी रहनुमाई किस तरह पूरी यकसूई से कर सकता है, इसलिए मस्जिद कमेटियों और तमाम नमाज़ियों की ये मुशतर्का ज़िम्मेदारी है कि इमाम-ओ- मोअज्ज़न की तनख़्वाहें महंगाई और बुनियादी अख़राजात को मद्द-ए-नज़र रखते हुए माक़ूल तौर पर तै की जाएं।
आज एक अर्से से ये सवाल हमारे ज़मीर को झिंझोड़ रहा है कि क्या हमने वाक़ई अपने इमाम और मोअज्ज़न की इज़्ज़त, वक़ार और जरूरतों को समझा है, क्या हमने उन्हें वो मुक़ाम दिया है, जिसके वो अख़लाक़न और समाजन हक़दार हैं।
ये बात वाजेह रहनी चाहिए कि इमाम और मोअज्ज़न किसी मस्जिद के मुलाज़िम और नौकर नहीं बल्कि क़ौम के मज़हबी रहनुमा और रहबर होते हैं। उनकी बेक़दरी दरअसल दीन की बेक़दरी है। यही वो नुक्ता है जिसकी तरफ़ एमडब्ल्यू अंसारी, आईपीएस और उनकी सोसाइटी पिछले दो सालों से मुसलसल तवज्जा दिला रही है। उन्होंने बारहा इस बात पर ज़ोर दिया है कि इमाम-ओ- मोअज्ज़न को हर तरह से मज़बूत बनाया जाए ताकि वो मआशी फ़िक्र से आज़ाद होकर दीन के काम के लिए ख़ुद को वक़्फ़ कर सकें।
बदक़िस्मती से आज भी अक्सर मसाजिद में इमाम-ओ- मोअज्ज़न की तनख़्वाहें इस महंगाई के दौर में नाकाफ़ी ही नहीं बल्कि इंतिहाई कम है। एक ऐसा इमाम जो किराया, बच्चों की तालीम, ईलाज और घर के अख़राजात की फ़िक्र में मुबतला हो, वो क़ौम की फ़िक्री-ओ-अख़लाक़ी रहनुमाई किस तरह पूरी यकसूई से कर सकता है, इसलिए मस्जिद कमेटियों और तमाम नमाज़ियों की ये मुशतर्का ज़िम्मेदारी है कि इमाम-ओ- मोअज्ज़न की तनख़्वाहें महंगाई और बुनियादी अख़राजात को मद्द-ए-नज़र रखते हुए माक़ूल तौर पर तै की जाएं।
मस्जिद को हमें सिर्फ नमाज़ तक महदूद नहीं रखना चाहिए। नमाज़ के बाद कुछ वक़्त ज़िक्र, तालीम, मुस्लमानों के तमाम मसाइल पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र और उनके हल, ज़माने के चैलेंजिज़ से मुक़ाबला करने के लिए लायहा अमल बनाने वग़ैरा में लगाना चाहिए। मुहल्ले में कौन बीमार है, कौन बेरोज़गार है, कौन फ़ाक़ाकशी का शिकार है, इन तमाम बातों से बाख़बर होना सिर्फ इमाम की नहीं बल्कि हर नमाज़ी की ज़िम्मेदारी है। अगर मस्जिद के ज़रीये ये इजतिमाई ख़बरगीरी शुरू हो जाए तो ना सिर्फ मसाइल कम होंगे बल्कि दिल भी जुड़ेंगे।
जनाब अंसारी की ये फ़िक्र निहायत अहम है कि मस्जिद अपने वसाइल से इतनी मज़बूत हो कि बिजली, पानी, सफ़ाई, वुज़ू ख़ानों और बैत-उल-खुला की देख-भाल, पंखे, कूलर और इमाम-ओ- मोअज्ज़न की तनख़्वाहों के लिए हमें किसी दूसरे ज़रीये की तरफ़ देखना ना पड़े। ये तभी मुम्किन है, जब हर नमाज़ी मस्जिद को अपनी ज़िम्मेदारी समझे।
फ़ज्र की नमाज़ में बच्चों की हाज़िरी और नौजवानों की फ़ज्र और अस्र की हाज़िरी महिज़ इबादत नहीं बल्कि क़ौम के मुस्तक़बिल की बुनियाद है। बच्चों की हौसला-अफ़ज़ाई के लिए तहाइफ़, किताबें या तालीमी सहूलयात फ़राहम की जाएं ताकि उनके दिल में मस्जिद के लिए मुहब्बत पैदा हो। यही बच्चे कल के इमाम, मुअल्लिम और ज़िम्मेदार शहरी बनेंगे।
इसी तरह हर मुहल्ले की मस्जिद में मकतब क़ायम करने की अशद ज़रूरत है, जहां दीनी तालीम के साथ साथ इंग्लिश, हिन्दी, साईंस, मैथ्स और कैरीयर काउंसलिंग का इंतिज़ाम हो। मस्जिद के अहाते में लाइब्रेरी का होना भी इंतिहाई ज़रूरी है। आज के दौर में दीन और दुनिया की तफ़रीक़ नुक़्सानदेह है। मस्जिद अगर बच्चों को अच्छा मुस्लमान होने के साथ-साथ बाख़बर और बासलाहीयत इन्सान बना दे तो यही असल कामयाबी है।
नमाज़ के औक़ात के अलावा हमारी मसाजिद ख़ाली रहती हैं। इन औक़ात में मस्जिद को कम्यूनिटी सर्विस सेंटर और इलमी मर्कज़ बनाया जा सकता है, जहां ग़रीबों की इमदाद, क़ानूनी मश्वरे, समाजी मसाइल का हल और रफ़ाही सरगर्मियां अंजाम दी जाएं। मस्जिद जितनी आबाद होगी, क़ौम उतनी ही मज़बूत होगी।
एक इज्तेमा से खिताब करते हुए कारी मुहम्मद परवेज ने आगे कहा कि यहां ये बात भी काबिल-ए-ज़िक्र है कि हम हमारे इमाम-ओ- मोअज्ज़न को मआशी ज़बोहाली से इतना फ़ारिग़ कर दें कि वो अपनी इलमी सलाहीयतों में और इज़ाफ़ा करते चले जाएं। अरबी, उर्दू और फ़ारसी पर मज़बूत गिरफत हासिल करें, नीज़ अंग्रेज़ी ज़बान पर भी उबूर हासिल कर लें, बच्चों के अक़ाइद की तालीम को तर्जीह दें और ये एहतिमाम करें कि हर बच्चा नमाज़ के साथ साथ नमाज़-ए-जनाज़ा और बुनियादी दीनी उमूर भी सीखे। ये इलम हर मुस्लमान के लिए ज़रूरी है, क्योंकि ज़िंदगी और मौत दोनों यक़ीनी हैं।
वाज़िह रहे कि तआवुन को हमें सिर्फ रुपय पैसे तक महदूद नहीं रखना चाहिए। अगर कोई वकील मुफ़ीद मश्वरा दे दे, कोई उस्ताद रहनुमाई कर दे, या कोई ताजिर किसी नौजवान के लिए रोज़गार का रास्ता हमवार कर दे तो ये भी अज़ीम तआवुन है। उसी इजतिमाई तआवुन से क़ौम का समाजी और सियासी शऊर बेदार होगा, जो वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
आज के बदलते दौर में उल्मा-ए-किराम से भी आजिज़ाना गुज़ारिश है कि वो अपने किरदार और दाइराकार को महिदूद ना रखें बल्कि वक़्त के तक़ाज़ों को समझते हुए ख़ुद को मल्टीलिंगुअल बनाएँ और दीनी उलूम के साथ असरी ज़बानों और जदीद तालीम में भी महारत हासिल करें। सिर्फ हाफ़िज़ या आलिम होना बिलाशुबा एक अज़ीम सआदत है, लेकिन अगर इसी के साथ कोई आलिम डाक्टर बने, कोई वकील हो, कोई इंजीनीयरिंग के शोबे में जाए, कोई मुंतज़िम (ऐडमिनिस्ट्रेटर) बने, कोई पुलिस, फ़ौज या दीगर सरकारी ख़िदमात में शामिल हो तो ये ना सिर्फ क़ौम बल्कि दीन के लिए भी ग़ैरमामूली ताक़त का बाइस होगा।
ऐसे उलमा जो मुख़्तलिफ़ ज़बानों, मुख़्तलिफ़ मैदानों और मुख़्तलिफ़ इदारों में मौजूद होंगे, वो इस्लाम की सही तर्जुमानी भी बेहतर अंदाज़ में कर सकेंगे और समाज में मुस्लमानों की मूसिर नुमाइंदगी भी। आज ज़रूरत इस बात की है कि उलमा मसाजिद और मदारिस तक महिदूद ना रहें बल्कि हर उस महाज़ पर मौजूद हों, जहां फ़ैसले होते हैं, पालीसियां बनती हैं और क़ौमों का मुस्तक़बिल तै किया जाता है।
आख़िर में, बस इतना ही कहा जा सकता है कि इमाम और मोअज्ज़न को मआशी फ़िक्र से आज़ाद करना वक़्त की अहम तरीन ज़रूरत है। माक़ूल तनख़्वाहों के ज़रीये या उनके शायाँ-ए-शान हुनर सिखा कर हमें अपने मज़हबी रहनुमाओं को मज़बूत बनाना होगा। जब मज़हबी रहनुमा मज़बूत होंगे तो यक़ीनन क़ौम में मुसबत तबदीली आएगी। अल्लाह तआला अंसारी साहिब और उनकी टीम को जज़ाए ख़ैर अता करे जो हमेशा मज़हबी रहनुमाओं के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं।
जनाब अंसारी की ये फ़िक्र निहायत अहम है कि मस्जिद अपने वसाइल से इतनी मज़बूत हो कि बिजली, पानी, सफ़ाई, वुज़ू ख़ानों और बैत-उल-खुला की देख-भाल, पंखे, कूलर और इमाम-ओ- मोअज्ज़न की तनख़्वाहों के लिए हमें किसी दूसरे ज़रीये की तरफ़ देखना ना पड़े। ये तभी मुम्किन है, जब हर नमाज़ी मस्जिद को अपनी ज़िम्मेदारी समझे।
फ़ज्र की नमाज़ में बच्चों की हाज़िरी और नौजवानों की फ़ज्र और अस्र की हाज़िरी महिज़ इबादत नहीं बल्कि क़ौम के मुस्तक़बिल की बुनियाद है। बच्चों की हौसला-अफ़ज़ाई के लिए तहाइफ़, किताबें या तालीमी सहूलयात फ़राहम की जाएं ताकि उनके दिल में मस्जिद के लिए मुहब्बत पैदा हो। यही बच्चे कल के इमाम, मुअल्लिम और ज़िम्मेदार शहरी बनेंगे।
इसी तरह हर मुहल्ले की मस्जिद में मकतब क़ायम करने की अशद ज़रूरत है, जहां दीनी तालीम के साथ साथ इंग्लिश, हिन्दी, साईंस, मैथ्स और कैरीयर काउंसलिंग का इंतिज़ाम हो। मस्जिद के अहाते में लाइब्रेरी का होना भी इंतिहाई ज़रूरी है। आज के दौर में दीन और दुनिया की तफ़रीक़ नुक़्सानदेह है। मस्जिद अगर बच्चों को अच्छा मुस्लमान होने के साथ-साथ बाख़बर और बासलाहीयत इन्सान बना दे तो यही असल कामयाबी है।
नमाज़ के औक़ात के अलावा हमारी मसाजिद ख़ाली रहती हैं। इन औक़ात में मस्जिद को कम्यूनिटी सर्विस सेंटर और इलमी मर्कज़ बनाया जा सकता है, जहां ग़रीबों की इमदाद, क़ानूनी मश्वरे, समाजी मसाइल का हल और रफ़ाही सरगर्मियां अंजाम दी जाएं। मस्जिद जितनी आबाद होगी, क़ौम उतनी ही मज़बूत होगी।
एक इज्तेमा से खिताब करते हुए कारी मुहम्मद परवेज ने आगे कहा कि यहां ये बात भी काबिल-ए-ज़िक्र है कि हम हमारे इमाम-ओ- मोअज्ज़न को मआशी ज़बोहाली से इतना फ़ारिग़ कर दें कि वो अपनी इलमी सलाहीयतों में और इज़ाफ़ा करते चले जाएं। अरबी, उर्दू और फ़ारसी पर मज़बूत गिरफत हासिल करें, नीज़ अंग्रेज़ी ज़बान पर भी उबूर हासिल कर लें, बच्चों के अक़ाइद की तालीम को तर्जीह दें और ये एहतिमाम करें कि हर बच्चा नमाज़ के साथ साथ नमाज़-ए-जनाज़ा और बुनियादी दीनी उमूर भी सीखे। ये इलम हर मुस्लमान के लिए ज़रूरी है, क्योंकि ज़िंदगी और मौत दोनों यक़ीनी हैं।
वाज़िह रहे कि तआवुन को हमें सिर्फ रुपय पैसे तक महदूद नहीं रखना चाहिए। अगर कोई वकील मुफ़ीद मश्वरा दे दे, कोई उस्ताद रहनुमाई कर दे, या कोई ताजिर किसी नौजवान के लिए रोज़गार का रास्ता हमवार कर दे तो ये भी अज़ीम तआवुन है। उसी इजतिमाई तआवुन से क़ौम का समाजी और सियासी शऊर बेदार होगा, जो वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
आज के बदलते दौर में उल्मा-ए-किराम से भी आजिज़ाना गुज़ारिश है कि वो अपने किरदार और दाइराकार को महिदूद ना रखें बल्कि वक़्त के तक़ाज़ों को समझते हुए ख़ुद को मल्टीलिंगुअल बनाएँ और दीनी उलूम के साथ असरी ज़बानों और जदीद तालीम में भी महारत हासिल करें। सिर्फ हाफ़िज़ या आलिम होना बिलाशुबा एक अज़ीम सआदत है, लेकिन अगर इसी के साथ कोई आलिम डाक्टर बने, कोई वकील हो, कोई इंजीनीयरिंग के शोबे में जाए, कोई मुंतज़िम (ऐडमिनिस्ट्रेटर) बने, कोई पुलिस, फ़ौज या दीगर सरकारी ख़िदमात में शामिल हो तो ये ना सिर्फ क़ौम बल्कि दीन के लिए भी ग़ैरमामूली ताक़त का बाइस होगा।
ऐसे उलमा जो मुख़्तलिफ़ ज़बानों, मुख़्तलिफ़ मैदानों और मुख़्तलिफ़ इदारों में मौजूद होंगे, वो इस्लाम की सही तर्जुमानी भी बेहतर अंदाज़ में कर सकेंगे और समाज में मुस्लमानों की मूसिर नुमाइंदगी भी। आज ज़रूरत इस बात की है कि उलमा मसाजिद और मदारिस तक महिदूद ना रहें बल्कि हर उस महाज़ पर मौजूद हों, जहां फ़ैसले होते हैं, पालीसियां बनती हैं और क़ौमों का मुस्तक़बिल तै किया जाता है।
आख़िर में, बस इतना ही कहा जा सकता है कि इमाम और मोअज्ज़न को मआशी फ़िक्र से आज़ाद करना वक़्त की अहम तरीन ज़रूरत है। माक़ूल तनख़्वाहों के ज़रीये या उनके शायाँ-ए-शान हुनर सिखा कर हमें अपने मज़हबी रहनुमाओं को मज़बूत बनाना होगा। जब मज़हबी रहनुमा मज़बूत होंगे तो यक़ीनन क़ौम में मुसबत तबदीली आएगी। अल्लाह तआला अंसारी साहिब और उनकी टीम को जज़ाए ख़ैर अता करे जो हमेशा मज़हबी रहनुमाओं के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं।

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