रबि उल अव्वल, 1448 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जिस बंदे के कदम अल्लाह की राह में गुबार आलूद हो गए उन्हें जहन्नम की आग छुए, ये नामुमकिन है।
-सहीह बुखारी
बख्तावर अदब
एक टांग से माजूर एक शख्स का दांगईयों से मस्जिद की हिफाजत करने वाला वो मंजर आपको जरूर याद होगा। वो मंजर जो काफी दिनों तक सोशल मीडिया में गर्दिश करता रहा था। ये वाकिया नेपाल की एक मस्जिद का है। सोशल मीडिया में गर्दिश करने वाली रील्स के मुताबिक कुछ दंगाई मस्जिद को नुकसान पहुंचाने की गरज से मस्जिद पहुंचे थे लेकिन वहां उनका सामना मस्जिद में मौजूद एक ऐसे शख्स से हुआ था जो एक टांग से माजूर था। इसके बावजूद उसने पूरी दिलेरी से मस्जिद का दिफा किया था। तब उस माजूर शख्स ने सोचा भी नहीं था कि इसके एवज उसे मदीने से बुलावा आएगा।
जी हां, से सच है
ये वाक़िया जनवरी के आख़िर में पेश आया था, जब सोशल मीडीया पर बड़े पैमाने पर गर्दिश करने वाली एक वीडीयो में एक टांग से माज़ूर एक शख़्स को बैसाखी के सहारे खड़े और हाथ में लाठी थामे हुए दिखाया गया था। वो नेपाल के ज़िला रोतहट में एक मस्जिद पर हमला करने की कोशिश करने वाले हुजूम के सामने डट कर खड़ा था।
वीडीयो ने पूरी इस्लामी दुनिया के लोगों को तो मुतास्सिर किया ही सऊदी एक्टीविस्टस उस वायरल वीडीयो में नज़र आने वाले शख़्स को तलाश करने के लिए मुहिम ही शुरू कर दी थी और आखिरकार उनकी तलाश कामयाब रही जिसके बाद नेपाल के रामपूर से ताल्लुक़ रखने वाले शेख़ रहीमुल्लाह के लिए एक नाक़ाबिल-ए-फ़रामोश सफ़र का दरवाज़ा खुला। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि अपनी बहादुरी के एतराफ़ में वो उमरा अदा करेंगे, और ऐसी मदद की पेशकश पाएँगे जो उनकी ज़िंदगी बदल कर रख देगी।
गुजिश्ता पांच अगस्त को शेख रहीम उल्ला अपने वालदैन के हमराह सऊदी अरब पहुंचे जहां उन्होंने उमरा अदा किया। ये सफ़र सऊदी अतीया दहिंदगान और मुंतज़मीन की जानिब से उनकी मस्जिद के दिफ़ा में बहादुरी से डटे रहने के एतराफ़ में स्पांसर किया गया था।
32 बरस के शेख़ रहीमुल्लाह और उनके वालदैन का मक्का मुकर्रमा में क़ियाम और उमरा की अदायगी के दौरान सऊदी शहरीयों और मुक़ामी रिहायशियों ने तहाइफ़ और ख़ुलूस-ए-दिल के साथ मुहब्बत-ओ-मेहमान-नवाज़ी से इस्तिक़बाल किया।
ये इक़दाम उन्हें उमरा की अदायगी के लिए सऊदी अरब लाने तक महदूद नहीं रहा बल्कि बदर एसोसीएशन ने उनकी कटी हुई टांग के लिए मस्नूई टांग फ़राहम करने की ज़िम्मेदारी भी उठाई।
केराला से ताल्लुक़ रखने वाले नौजवान कंटेट क्रिएटर मुहम्मद रफ़ी, जो सोशल मीडीया के लिए अरबी ज़बान में मवाद तैयार करते हैं, ने नेपाली शख़्स और उनके अहल-ए-ख़ाना से मुलाक़ात की और सऊदी अरब में क़ियाम के दौरान उनके साथ रहे। उन्होंने सऊदी भाईयों के तंई इजहारे तशक्कुर किया जिनकी बदौलत रहीमुल्लाह उमरा अदा कर सके। वो मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा में अपने और अपने अहल-ए-ख़ाना की मेहमान-नवाज़ी पर बहुत ख़ुश हैं।
उन्होंने मज़ीद कहा कि 'मुझे यक़ीन है कि वो इस सफ़र को कभी नहीं भूलेंगे। उमरा अदा करने पर उनकी ख़ुशी नाक़ाबिल-ए-बयान थी और उनकी कहानी वाक़ई मुतास्सिर करने वाली है जो सब्र, साबित क़दमी और ईमान की अमली तस्वीर पेश करती है।
उमरा की अदायगी के बाद रहीमुल्लाह और उनके अहल-ए-ख़ाना 14 अगस्त को नेपाल रवाना हो गए, अपने साथ इस ख़ूबसूरत सफ़र की यादें और सऊदी शहरीयों समेत उन तमाम अफ़राद के लिए दिल में शुक्रगुज़ारी के जज़बात लिए जिन्होंने इस सफ़र को मुम्किन बनाने में अपना किरदार अदा किया।
(फोटो और कंटेट उर्दू न्यूज से शुक्रिया के साथ)



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