ताईफ के बाद आप ﷺ के लिए सबसे जाईद तकलीफदेह साल

 जिल हज्ज, 1447 हिजरी 

फरमाने रसूल ﷺ

कयामत के दीन मोमिन के मीज़ान में अखलाक-ए-हसना (अच्छे अखलाक) से भारी कोई चीज़ नहीं होगी, और अल्लाह ताअला बेहया और बदज़बान से नफरत करता है।

- जमाह तिर्मिज़ी 


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  •     ✅ मक्का मुकर्रमा से ज़ाकिर घुरसेना

    जबल-ए-उहुद के मैदान में रसूल अल्लाह  के चचा हजरत हमजा के अलावा तकरीबन 70 शोहदा की कब्र मुबारक है। वहां जाने पर पता चलता है कि आखिर क्यों वह साल रसूल अल्लाह  के लिए ताइफ़ के बाद सबसे जाईद तकलीफ़देह साल था। हालांकि ग़ज़वा-ए-उहुद में कुफ्फारे मक्का को मुंह की खानी पड़ी थी। यही नहीं, कुफ्फारे मक्का में जिनका शुमार बड़े शूरमाओं में होता था, वो सब भी गजवा-ए-उहद में मारे जा चुके थे। गजवा-ए-उहद दरअसल गजवा-ए-बद्र में मारे कुफ्फारे मक्का के अबू सूफियान के ससुर यानि हिंदा के बाप रबीअह, उसका भाई वलीद बिन उत्बा, चर्चा शैबा बिन रबीअह की मौत का बदला लेने के लिए कुफ्फारे मक्का की तरफ से शुरू की गई थी लेकिन इस जंग में कुफ्फारे मक्का को हार का सामना करना पड़ा।

    जंग-ए-उहुद शव्वाल, 3 हिजरी (मार्च 625 ईस्वी) में मदीना मुनव्वरा के करीब उहुद पहाड़ के दामन में मुसलमानों और कुरैश-ए-मक्का के बीच लड़ी गई थी। कुरैश-ए-मक्का की तरफ से ये जंग ग़ज़वा-ए-बदर में मिली शर्मनाक हार और अपने बडे शूरमाओं की मौत का बदला लेने के लिए मुसल्लत की गई थी। 

    दूसरी ओर मदीना के मुसलमानों की ताकत बढ़ने के सबब मक्का के कारोबारी काफिलों का शाम जाना मुश्किल हो गया था, जिससे उनकी मईशत खतरे में पड़ गई थी। लेहाजा अबू सूफ़ियान की क़ियादत में मक्का से 3,000 का मुसल्लह लश्कर रवाना मदीना की जानिब रवाना हुआ, जिसमें 200 घुड़सवार और 700 ज़िरहपोश शामिल थे।

    इसकी खबर मिलने पर रसूल अल्लाह  की क़ियादत में 1,000 सहाबा-ए-कराम का लश्कर मदीना से रवाना हुआ। लेकिन अभी ये काफिला कुछ ही आगे बढ़ा था कि मुनाफ़िकों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबी अपने 300 साथियों को लेकर काफिले से अलग हो गया, जिसके बाद मुसलमानों की तादाद महज 700 रह गई। जबकि कुफ्फारे मक्का के फौजियों की तादाद तीन हजार थी। 

    हालात को देखते हुए रसूल अल्लाह ने उहुद पहाड़ को अपनी पीठ पर रखा ताकि दुश्मन पीछे से हमला न कर सके। आप  ने पहाड़ी के एक अहम दर्रे (जिसे जबल-ए-रुमात कहा जाता है) पर 50 तीरंदाज़ों का एक दस्ता हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर रज़ि. की क़ियादत में तैनात किया और उन्हें हिदायत की कि तुम चाहे देखो कि हमें फतह मिल गई है, या हमें परिंदे नोच रहे हैं, तुम्हे अपनी यह जगह हरगिज़ नहीं छोड़नी है, जब तक मैं खुद पैग़ाम न भेजूँ।

जब दुश्मन फौज के पैर उखड़ गए

जंग शुरू होते ही मुसलमानों ने बहादुरी से दुश्मनों का मुकाबला किया। हज़रत अली, हज़रत हमज़ा और दीगर सहाबा-ए-कराम की बहादुरी के सामने काफ़िरों के कदम उखड़ गए और वे मैदान छोड़कर भागने लगे। यहाँ तक कि मुसलमान फतह के करीब पहुँच गए और यही वो वक्त था जब मुसलमानों का ध्यान जंग से हटकर माल-ए-गनीमत की तरफ चला गया। पहाड़ी पर मौजूद तीरंदाज़ों, जिन्हें पैगंबर-ए-इस्लाम  किसी भी सूरत अपनी जगह से न हटने की हिदायत की थी,  काफिरों को भागते और फौज के दीगर मुसलमानों को माले गनीमत की तरफ लपकता देख, उन्होंने सोचा, जंग खत्म हो गई और इसके साथ ही वो सब भी माले गनीमत की तरफ दौड़ पड़े। इस टुकड़ी की कयादत कर रहे हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर रज़ि. ने उन्हें रोकने की कोशिश की इसके बावजूद तकरीबन सभी जंगजूओं ने मैदान की ओर दौड़ लगा दी। 

मौका देख दुश्मन फौज ने किया पीछे से हमला

पहाड़ी पर तैनात टुकड़ी को मैदान की ओर दौड़ लगाते देख ख़ालिद बिन वलीद (जो उस वक्त तक ईमान नहीं लाए थे और काफ़िरों के घुड़सवार दस्ते के कमांडर थे), ने दर्रा खाली देख, पीछे से घूमकर मुसलमानों पर अचानक और ज़बरदस्त हमला कर दिया। इस अचानक हुए हमले से मुसलमानों में अफरा-तफरी मच गई। भागते हुए काफ़िर भी वापस लौट आए। हालत यह हो गई कि मुसलमान दोनों तरफ़ से घिर गए। और उसी दौरान यह अफवाह फैल गई कि (नऊज बिल्लाह) रसूल अल्लाह  शहीद हो गए हैं, जिससे मुसलमानों के हौसले और टूट गए।

आप  के दंदाने मुबारक हुए शहीद

इसी जंग में नबी करीम  के दंदान-ए-मुबारक शहीद हुए थे। यहां तक कि आप  शदीद ज़ख्मी भी हो गए थे। जब मुसलमानों को खबर मिली कि आप  की शहादत की खबर झूठी है और मुसलमानों ने आप  को अपनी पनाह में ले लिया आप  को पहाड़ की एक ऊची चोटी पर ले गए। 

अबू सूफ़ियान पहाड़ के करीब आकर नारे लगाने लगा, लेकिन मुसलमानों की मज़बूत पोज़िशन देखकर वह आगे बढ़ने की हिम्मत न कर सका और उसे मक्का लौट जाना पड़ा। इस जंग में 70 सहाबा-ए-किराम शहीद हुए, जिनमें हज़रत हमज़ा, हज़रत मुसअब बिन उमैर और हज़रत अनस बिन नज़र रज़ि. जैसे जलीलुल क़द्र सहाबा शामिल थे। 

शोहदा में शामिल जलीलुलकद्र सहाबा-ए-कराम 

सैय्यदुश्शुहदा हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब रदिअल्लाहो अन्हो

हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब रदिअल्लाहो अन्हो रसूल अल्लाह  के सगे चाचा और रज़ाई भाई थे। अपनी बहादुरी की वजह से असदुल्लाह (अल्लाह का शेर) कहलाते थे। उन्हें जुबैर बिन मुतइम के गुलाम वह्शी ने नेज़ा मारकर शहीद किया, और बाद में हिन्दा ने उनका जिगर निकालकर चबाने की नापाक कोशिश की।

हज़रत मुसअब बिन उमैर रदिअल्लाहो अन्हो

आप इस्लाम के पहले सफीर थे जिन्हें रसूल अल्लाह  ने मदीना तबलीग़ के लिए भेजा था। ग़ज़वा-ए-उहुद में आप मुसलमानों के झंडा बरदार थे। दोनों हाथ कट जाने के बावजूद आपने झंडा सीने से लगाए रखा यहाँ तक कि शहीद हो गए।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर रदिअल्लाहो अन्हो.

आप उन 50 तीरंदाज़ों के अमीर थे जिन्हें दर्रे पर तैनात किया गया था। जब बाकी लोग नीचे उतर गए तो आप अपने कुछ साथियों के साथ डटे रहे और लड़ते हुए शहीद हो गए।

हज़रत हंज़ला बिन अबी आमिर रदिअल्लाहो अन्हो (ग़सीलुल मलाइका)

आपकी शादी को अभी सिर्फ एक दिन हुआ था कि जंग की पुकार आ गई। आप बिना ग़ुस्ल किए मैदान में पहुँचे और शहीद हो गए। रसूल अल्लाह  ने फरमाया कि फरिश्ते इन्हें ग़ुस्ल दे रहे थे।

हज़रत अनस बिन नज़र रदिअल्लाहो अन्हो

जब यह अफवाह फैली कि रसूल अल्लाह  शहीद हो गए हैं (नाउज बिल्लाह), तो आपने कहा था- अगर रसूल अल्लाह  शहीद हो गए हैं तो उनके बाद ज़िंदा रहकर क्या करना? उठो और उसी चीज़ पर जान दे दो जिस पर रसूल अल्लाह  ने जान दी।

हज़रत अम्र बिन जमूह रदिअल्लाहो अन्हो

आप एक टांग से लंगड़े थे, इसके बावजूद आपका कौल था- खुदा की कसम! मैं चाहता हूँ कि अपने इस लंगड़ेपन के साथ जन्नत में चलूँ। और बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गए।

हज़रत सअद बिन रबीअ रदिअल्लाहो अन्हो

आपने आख़िरी सांसों में यह पैगाम दिया-अगर तुम ज़िंदा रहे और दुश्मन रसूल अल्लाह  तक पहुँच गया, तो अल्लाह के यहाँ तुम्हारा कोई बहाना कबूल नहीं होगा।

    मुशरिकीन-ए-मक्का ने इन शहीदों के जिस्मों को बेहद बेरहमी से मुस्ला किया (यानी उनके कान और नाक काटे)। इन शहीदों को उहुद के मैदान में ही उनके खून से सने कपड़ों में दफन किया गया। दूसरी ओर इस जंग में कुफ्फारे मक्का के तकरीबन 23 लोग मारे गए।

    हिन्दा बिन्त उत्बा (जो अबू सूफ़ियान की बीवी और अमीर मुआविया रदिअल्लाहो अन्हो की वालिदा थीं) को हज़रत हमज़ा रदिअल्लाहो अन्हो से बेहद नफरत थी, इसकी वजह जंग-ए-बद्र में उसके बाप, भाई और चाचा मारे गए थे। इसी नफरत के सबब उसने वह्शी नाम के गुलाम को हज़रत हमज़ा को शहीद करने के लिए तैयार किया।

    जब रसूल अल्लाह  अपने चचा हज़रत हमज़ा रदिअल्लाहो अन्हो की लाश के पास पहुँचे और उनकी हालत देखी, आप ﷺ बेहद ग़मगीन हुए और आपकी  आँखों से आँसू बह निकले थे।

    मदीना लौटने पर जब रसूल अल्लाह  ने देखा कि हर घर से अपने शहीदों पर रोने की आवाज़ें आ रही हैं, लेकिन हज़रत हमज़ा रदिअल्लाहो अन्हो का कोई रिश्तेदार मदीना में नहीं था। तब आप  ने फरमाया : अफसोस! हमज़ा का कोई रोने वाला नहीं है।

जब खुशी से हिलने लगा पहाड़

रसूल अल्लाह  को उहुद पहाड़ से बेहद मोहब्बत थी। आप  ने फरमाया-उहुद पहाड़ को हमसे और हमें इससे मोहब्बत है।

एक बार का वाकिया है, रसूल अल्लाह , हज़रत अबूबक्र, हज़रत उमर और हज़रत उस्मान रदि अल्लाहो अन्हो के साथ उहुद पहाड़ पर चढ़े तो पहाड़ खुशी से हिलने लगा। ये देखकर आप  ने कहा था- उहुद! ठहर जा, क्योंकि तुझ पर एक नबी, एक सिद्दीक और दो शहीद मौजूद हैं।




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