जिल हज्ज, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
कामिल मोमिन वो है, जो खुश अखलाक हो और घर वालों से नरम सुलूक करने वाला हो।
- तिर्मिज़ी
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मिंबर-ए-रसूल ﷺ के बिल्कुल बगल में एक चबूतरा और एक सुतून असहाब-ए-सुफ्फा के नाम से मंसूख है। तारीख-ए-इस्लाम में इस जगह की बड़ी अहमियत आई है। आजमीने हज और उमराह जायरीन इस मुबारक जगह पर नफिल अदा कर दुआए खैर करते हैं।
कौन हैं असहाब-ए-सुफ्फा और क्या है उनकी अहमियत
मस्जिद-ए-नबवी ﷺ के शिमाल-मश्रिक (उत्तर-पूर्वी) हिस्से में एक ऊँचा चबूतरा खास तौर पर इन असहाब-ए-सुफ्फा के लिए बनाया गया था जो आज भी मस्जिद-ए-नबवी ﷺ में 'रियाज़ुल जन्नह' के ठीक पीछे मौजूद है। असहाब-ए-सुफ्फा के आमाल और उनके किरदार की बिना पर इस मख्सूस जगह को इस जगह को रेसिडेंसियल यूनिवर्सिटी कहा जाता है।
असहाब-ए-सुफ्फा दरअसल उन मशहूर सहाबा-ए-कराम का ग्रुप को कहा जाता है, जिन्होंने अपना पूरी जिंदगी अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की खिदमत और हुसूले इल्म के लिए सर्फ कर दी थी। बावजूद इसके कि उनकी ज़िंदगी इंतेहाई गुरबत में बसर हो रही थी। मदीना मुनव्वरा में न उनके पास रहने को घर था और न कोई जरिया-ए-मआश। यहां तक कि वे किसी कबीले से भी नहीं थे। जबकि उस दौर में कबीले के बिना किसी शख्स की ज़िंदगी बिल्कुल वैसी ही हुआ करती थी जैसी पानी के बिना कोई मछली। उस दौर में ज़िंदा रहने के लिए हर एक के लिए किसी कबीले का होना निहायत जरूरी हुआ करता था।
सुफ़्फ़ा का माना हुआ 'साया' या 'छत वाला चबूतरा'
सुब्ह-ओ-शाम अल्लाह की इबादत में मशगूल रहने, हर वक्त पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ की सोहबत में रहने कुरआन सीखने और हदीसों को याद करने वाले इन असहाब-ए-सुफ्फा की तादाद कम-ज्यादा हुआ करती थी। कभी उनकी तादाद 70 हो जाती तो कभी बढ़कर 400 तक पहुंच जाती। बेहद सादगी में ज़िंदगी बसर करने वाली इन मुबारक हस्तियों की जिम्मेदारी खुद पैगंबर-ए-इस्लाम ने उठा रखी थी। कुछ मालदार सहाबा-ए-कराम भी इनकी जिम्मेदारी में अक्सर पेश-पेश रहा करते थे।
तब्लीग में कलीदी किरदार अदा करने वाले इन असहाब-ए-सुफ्फा में हज़रत अबू हुरैरा (रदी अल्लाह अन्ह) (सबसे जाईद हदीसें बयान करने वाले), हज़रत अबू ज़र गफ़ारी (रदी-अल्लाह-अन्ह), हज़रत बिलाल हब्शी (रदी-अल्लाह-अन्ह) और हज़रत हुज़ैफ़ा बिन यमान (रदी-अल्लाह-अन्ह) जैसी मुबारक हस्तियां शामिल हैं।
जब कोई शख्स या कबीला ईमान ले आता तो उन्हें इस्लाम की जानकारी देने के लिए आप ﷺ इन्हीं मुबारक हस्तियों की मदद लेते।
दुनियावी लज्जत से दूर महरूम रहते हुए ये मुबारक हस्तियां पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ की वफादार साथी थी। खुद गुरबत में ज़िंदगी बसर करते हुए आने वाली नस्लों को इल्म की दौलत से मालामाल करने वाली इन मुबारक हस्तियों की वो मख्सूस जगह आज भी इल्म-ओ-अदब, नसीहत और इबादत का गहवारा बनी हुई है।


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