जिल हज्ज, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
कयामत के दीन मोमिन के मीज़ान में अखलाक-ए-हसना (अच्छे अखलाक) से भारी कोई चीज़ नहीं होगी, और अल्लाह ताअला बेहया और बदज़बान से नफरत करता है।
- जमाह तिर्मिज़ी
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इस्लाम की सबसे मुबारक मस्जिदों में शामिल मस्जिद-ए-नबवी ﷺ वो मुबारक मस्जिद है जो इस्लाम के शुरुआती दिनों में वजूद में आई थी। मक्का मुकर्रमा से मदीना मुनव्वरा हिजरत के फौरन बाद आप ﷺ ने इसकी ताअमीर में अजखुद हिस्सा लिया। मक्का मुकर्रमा से मदीना मुनव्वरा हिजरत का वो साल 622 ईस्वी है, उसी साल से हिजरी साल की शुरुआत हुई। मदीना मुनव्वरा पहुंचकर पैगंबर-ए-इस्लाम ﷺ ने सबसे पहला जो काम किया, वो इसी मस्जिद की ताअमीर का था।
यतीम बच्चों की थी ज़मीन
जिस जगह आज ये आलीशान मस्जिद खड़ी है, वह ज़मीन दो यतीम बच्चों सहल और सुहैल की थी। उस जमाने में वह ज़मीन खजूर सुखाने के काम में लाई जाती थी। एक हिस्सा पुरानी कब्रों का था। यतीम बच्चों ने मस्जिद के लिए वह ज़मीन तोहफतन देनी चाही लेकिन हुज़ूर अकरम ﷺ ने उसे तोहफतन लेने की बजाए उजरत देकर वह जमीन ली।
किसने करवाई ताअमीर
मस्जिद की तामीर अजखुद आप ﷺ ने करवाई। ताअमीर में असहाबे कराम ने जोश-ओ-खरोश से हिस्सा लिया। इनमें हजरत अबु बक्र सिद्दीक, हजरत उमर इब्न अल खत्ताब, हजरत अली इब्ने तालिब और हजरत अबु अयूब अल अंसारी वगैरह सहाबी-ए-कराम भी शामिल थे। मस्जिद की ताअमीर के दौरान रसूल अल्लाह ﷺ खुद ईंट-पत्थर उठाते। हालांकि सहाबी-ए-कराम आप ﷺ को ऐसा करने से रोकते लेकिन आप ﷺ सहाबी-ए-कराम के शाना-ब-शाना मस्जिद की ताअमीर में शामिल रहे।
खजूर के दरख्त की डालियां और पत्तों से बनी छत
शुरुआती दौर में मस्जिद बहुत सादा बनी थी। दीवारें कच्ची ईंटों और मिट्टी की तैयार हुई। सुतून के लिए खजूर के तनों का इस्तेमाल किया गया। छत खजूर के दरख्त की डालियों और पत्तों से तैयार की गई। फर्श मिट्टी और रेत बिछाई गई। इस तरह सात-आठ महीने में मस्जिद की ताअमीर मुकम्मल हुई। हालांकि दीवारें और छत कच्ची होने के सबब बारिश के मौसम में पानी मस्जिद के भीतर रिसता था।
इस्लामी मुआमलात का मर्कज बनीं मस्जिद
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गौरतलब है कि ये मस्जिद तब वजूद में आई थी, जब आप ﷺ ने तब्लीग शुरु की थी। ये वो दौर भी था जब मक्का के कुरैश आप ﷺ और मुसलमानों पर जुल्म ढाते थे। मक्का मुकर्रमा में तो हालत ये थी कि खुले में नमाज अदा नहीं की जा सकती थी। मदीना मुनव्वरा में मस्जिद-ए-नबवी की ताअमीर से न सिर्फ नव मुस्लिमों को नमाज की जगह मिली, बल्कि इस्लामी मुआमलात के लिए ये एक बड़ा मर्कज भी साबत हुई।
नमाज के अलावा ये इल्म का गहवारा और इस्लामी मुआमलात के फैसलों का गहवारा बनीं। दूर-दराज से आने वाले मुसलमान यहां आराम फरमाते तो अस्हाब-ए-सुफफा (गरीब सहाबा) के लिए ये ठिकाना भी बनी।
जंग-ए-ख़ैबर के साथ जब मुसलमानों की तादाद में हुआ इजाफा
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मदीना मुनव्वरा हिजरत के सात साल बाद यानि सन 7 हिजरी में, ग़ज़वा-ए-खैबर का वाकिया पेश आया। ग़ज़वा-ए-खैबर में फतह नसीब होने के साथ ही मुसलमानों की तादाद में खासा इजाफा हो गया। इसका असर नमाजियों की तादाद पर भी पड़ा। नमाजियों की तादाद बढ़ने से मस्जिद छोटी पड़ने लगी जिसके बाद मस्जिद की तौसीअ कराने की जरूरत पेश आई। इसके साथ ही मस्जिद की पहली बार तौसीअ कराने का काम शुरू हुआ। इसके लिए उस्मान इब्ने अफ्फान ने पास की ज़मीन खरीद कर पेश की। बाद में उमर इब्न खत्ताब, उस्मान इब्न अफ्फान रदि अल्लाहो अन्हो के दौर में मस्जिद की तौसीअ कराई गई। इसके अलावा उमय्यद खलीफा, अब्बासी और उस्मानी सल्तनत के दौर में भी मस्जिद की तजईन व तौसीअ कराई गई। आगे चलकर सउदी हुकूमत ने इसकी तौसीअ कराई।
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आज इस मस्जिद में लाखों नमाजी एक साथ नमाज अदा करते हैं। हजर व उमराह के दौरान इस मस्जिद में चालीस नमाज अदा करने की बड़ी फजीलत बताई गई है।




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