मैदान-ए-अराफ़ात

 जिल हज्ज, 1447 हिजरी 

   फरमाने रसूल      

क्या मैं तुम्हें ये ना बता दूँ के जहन्नुम किस पर हराम है? फिर फरमाया जहन्नुम उस शख्स पर हराम है, जो लोगों के साथ नरमी और सहूलियत के मामला इख्तियार करें।

- तिर्मिज़ी 


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✅ मक्का मुकर्रमा से ज़ाकिर घुरसेना

    मैदान-ए-अराफात मज़हबे इस्लाम का एक मुक़द्दस और अहम मैदान है, जो मक्का से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर वाके है। इसे मैदान-ए-अराफ़ात और जबल-ए-रहमत (रहमत का पहाड़) के नाम से भी जाना जाता है। हज का सबसे बड़ा रुक्न यही आदा होता है। तयशुदा वक्त पर अराफात पर मौजूद न होने का मतलब हज का मुकम्मल न होना माना जाता है। 

अराफ़ात नाम इसलिए पड़ा

अराफ़ात लफ्ज अरबी के अरफ़ा से निकला है, जिसका मतलब है पहचानना या मुलाक़ात होना। रिवायतों के मुताबिक जब हजरत आदम अलैहिस्सलाम और हजरत हव्वा रदिअल्लाहो अन्हो जन्नत से दुनिया में भेजे गए, तो उनकी मुलाक़ात इसी मैदान में हुई थी। इसलिए इसे अराफ़ात कहा गया। 


हज में अराफ़ात की अहमियत

मैदान-ए-अराफात के मुताल्लिक रसूल अल्लाह ﷺ का कौल है, अल-हज्जु अरफ़ा यानी हज तो अराफ़ात ही है। इस हदीसे मुबारका के मुताबिक अराफ़ात में वुक़ूफ़ (ठहरना) हज का सबसे अहम हिस्सा है। 9 ज़िल हिज्जा को दुनियाभर के लाखों आजमीने हज यहाँ जमा होकर अल्लाह से दुआ, तौबा और इबादत करते हैं। यही दिन यौम-ए-अरफ़ा कहलाता है, जो इस्लाम के सबसे अफ़ज़ल दिनों में से एक है। 


जबल-ए-रहमत (रहमत का पहाड़)

जबले रहमत अराफ़ात के मैदान के बीच में मौजूद मशहूर पहाड़ी है। माना जाता है कि यहीं हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और हज़रत हव्वा की मुलाक़ात हुई थी। इसी जगह पर हजरत मोहम्मद मुस्तफा ﷺ ने अपने आख़िरी हज में ख़ुत्बा-ए-हज्जतुल विदा दिया था। 


ख़ुत्बा-ए-हज्जतुल विदा

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10 हिजरी में, रसूल अल्लाह ﷺ ने अराफ़ात के मैदान में एक बहुत अहम ख़ुत्बा दिया, जिसमें इंसानियत, बराबरी, औरतों के हुक़ूक़ और मुसलमानों की एकता का पैग़ाम दिया गया था। तब 1 लाख से जाईद सहाबा मौजूद थे। 


अराफ़ात के अरकान 

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आजमीने हज 9 ज़िलहिज्जा की दोपहर से लेकर मग़रिब तक मैदान-ए-अराफ़ात में कयाम करते हैं। इस अमल को वुक़ूफ़-ए-अराफ़ात कहा जाता है। इस दौरान आजमीने हज नफली इबादतें, तौबा अस्तगफार, तस्बीह और जिक्र और अल्लाह से रो-रोकर दुआएं की जाती है। 


यौम-ए-अरफा की फजीलत

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हदीस के मुताबिक अरफा के दिन से बढ़कर कोई दिन नहीं जिसमें अल्लाह ताअला सबसे ज़्यादा लोगों को जहन्नम से आज़ाद करता है। आजमीने हज के अलावा अपने घरों पर रहने वालों के लिए ये दिन बहुत अहमियत और फजीलत वाला है। हदीस के मुताबिक अरफा का रोज़ा पिछले और अगले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बनता है। 


मस्जिद-ए-नमिरा

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मस्जिदे नमिरा अराफ़ात में मौजूद एक बहुत बड़ी और मशहूर मस्जिद है। यहीं से हज का ख़ुत्बा दिया जाता है और ज़ुहर व असर की नमाज़ एक साथ अदा की जाती है। 


मैदान-ए-अराफ़ात से आगे

मग़रिब के बाद सभी आजमीने हज मैदान-ए-अराफ़ात से निकलकर मुजदलिफा जाते हैं, जहाँ रात गुज़ारते हैं और अगले दिन जमरात के लिए कंकड़ियाँ जमा करते हैं।


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