अपनी नस्लों के लिए रास्ता मुतअय्यन करने वाली शख्सियात को भी याद रखती है तारीख : एमडब्ल्यू अंसारी

 सफर उल मुजफ्फर, 1448 हिजरी

   फरमाने रसूल      

क्या मैं तुम्हें जहन्नमी लोगों के बारे में ना बताऊं, वो शख्स सख्त मिजाज़, बदअखलाख और तकब्बुर करने वाला जहन्नमी है।

(सहीह बुखारी)


उर्दू अदब के मुहक़्क़िक़, नक़्क़ाद, डाक्टर राज बहादुर गौड़ की यौम-ए-पैदाइश पर खास



✅ बख्तावर अदब : भोपाल 

    हर साल, 21 जुलाई को उर्दू अदब के मुहक़्क़िक़, नक़्क़ाद, मुजाहिद-ए-आज़ादी, अवामी रहनुमा और हिंदू-मुस्लिम इत्तिहाद के अलमबरदार डाक्टर राज बहादुर गौड़ की यौम पैदाइश पर उन्हें ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने के लिए मज़ामीन लिखे जाते हैं, सेमीनार मुनाक़िद किए जाते हैं और उनकी ख़िदमात को याद किया जाता है। ये एक ख़ुश आइंद रिवायत है, लेकिन इससे भी ज़्यादा ज़रूरी सवाल है कि क्या हम उस मक़सद को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसके लिए डाक्टर राज बहादुर गौड़ ने अपनी पूरी ज़िंदगी वक़्फ़ कर दी।

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तारीख़ सिर्फ उन्हें ही याद नहीं रखती, जिन्होंने बड़े ओहदे हासिल किए बल्कि उन्हें ज़िंदा रखती है, जिन्होंने आने वाली नसलों के लिए रास्ता मुतय्यन किया हो। डाक्टर राज बहादुर गौड़ ऐसी ही जलील-उल-क़दर शख़्सियात में शामिल हैं, जिन्होंने सियासत, समाजी ख़िदमत, ट्रेड यूनीयन तहरीक, अदबी तन्क़ीद और उर्दू ज़बान के फ़रोग़ को एक-दूसरे से अलग नहीं समझा, बल्कि उन सब को अवामी ख़िदमत का हिस्सा क़रार दिया।

    डाक्टर राज बहादुर गौड़ की सबसे बड़ी ख़ुसूसीयत ये थी कि उन्होंने उर्दू को किसी एक मज़हब या तबक़े की ज़बान नहीं समझा। उनके नज़दीक उर्दू भारत की मुशतर्का तहज़ीब, गंगा जमुनी रिवायत, आज़ादी की तहरीक और क़ौमी यकजहती की ज़बान थी। आज जब बाअज़ हलक़े उर्दू को एक मख़सूस शिनाख़्त तक महिदूद करने की कोशिश करते हैं तो राज बहादुर गौड़ की पूरी ज़िंदगी इस सोच की नफ़ी करती नज़र आती है। एक हिंदू ख़ानदान में पैदा होने वाला शख़्स जब अपनी ज़िंदगी उर्दू, उसके इदारों और उसकी बक़ा के लिए वक़्फ़ कर देता है तो वो दरअसल ये पैग़ाम देता है कि ज़बानें मज़हब से नहीं बल्कि तहज़ीब-ओ-तमद्दुन, तारीख़ और मुहब्बत से पहचानी जाती हैं

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    उन्होंने एक मौक़ा पर कहा था, उर्दू वालों को किसी ख़ुशगुमानी में रहने की ज़रूरत नहीं है, उर्दू को उसका हक़ मिलने तक जद्द-ओ-जहद करनी होगी।' ये जुमला नसफ़ सदी पहले भी हक़ीक़त था और आज भी उतना ही मानी-ख़ेज़ है। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि उस ज़माने में जद्द-ओ-जहद का मैदान सड़कें, इदारे और असेंबलियां थीं, जबकि आज इसमें डिजीटल दुनिया, सोशल मीडिया और मस्नूई ज़हानत भी शामिल हो चुकी है।

    आज का नौजवान किताब से ज़्यादा मोबाइल फ़ोन इस्तिमाल करता है। वो रोज़ाना सैकड़ों पैग़ामात लिखता है, ख़्यालात का इज़हार करता है और दुनियाभर से राबते में रहता है। अफ़सोस की बात ये है कि उनमें से बेशतर तहरीरें रोमन उर्दू में होती हैं। अगर यही नसल उर्दू रस्म-उल-ख़त में लिखने की आदत डाल ले तो उर्दू की बक़ा के लिए किसी बड़े सरकारी मंसूबे का इंतिज़ार नहीं करना पड़ेगा। ज़बानें हुकूमतों के हुक्म से नहीं बल्कि अवाम के इस्तिमाल से ज़िंदा रहती हैं

    इस हक़ीक़त से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उर्दू आज मुख़्तलिफ़ चैलेंजिज़ से दो-चार है। कई इलाक़ों में उर्दू मीडियम स्कूलों की तादाद कम हो रही है बल्कि ना के बराबर है, उर्दू पढ़ने वालों की तादाद में कमी महसूस की जा रही है और बाअज़ इदारे वसाइल की कमी का शिकार हैं। लेकिन सिर्फ शिकायतें करना किसी मसले का हल नहीं। डाक्टर राज बहादुर गौड़ ने हमें ये सबक़ दिया कि ज़बान की ख़िदमत अमली मैदान में उतर कर की जाती है।

    ये बात भी काबिल-ए-ग़ौर है कि अपनी ज़िंदगी के आख़िरी अय्याम में उन्होंने उर्दू तालीमी ट्रस्ट को तीन लाख रुपय का अतिया दिया। ये सिर्फ़ माली तआवुन नहीं था बल्कि एक वाजेह पैग़ाम था कि अगर हम किसी ज़बान से मुहब्बत का दावा करते हैं तो उसकी तालीमी बुनियादों को भी मज़बूत करना होगा। आज ज़रूरत इस बात की है कि अहल-ए-सरवत, तालीमी इदारे, समाजी तंज़ीमें और उर्दू से मुहब्बत रखने वाले अफ़राद मिलकर ऐसे फ़ंड क़ायम करें जिनसे ग़रीब तलबा की तालीम, उर्दू किताबों की इशाअत, लाइब्रेरियों की तरक़्क़ी और जदीद टैक्नोलोजी के ज़रीये उर्दू की तरवीज मुम्किन हो सके।

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    ये भी हक़ीक़त है कि उर्दू की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ हुकूमतों पर नहीं डाली जा सकती। ख़ुद उर्दू वालों को भी अपना एहतिसाब करना होगा। हम में से कितने लोग अपने घरों में उर्दू अख़बारात मंगवाते हैं? कितने वालदैन अपने बच्चों को उर्दू रस्म-उल-ख़त सिखाते हैं? कितने नौजवान सोशल मीडीया पर मयारी उर्दू में लिखने की कोशिश करते हैं? कितने अहल-ए-क़लम नई नसल के लिए ऐसी तहरीरें तख़लीक़ कर रहे हैं जो उनकी दिलचस्पी के मुताबिक़ हों? अगर इन सवालों के जवाब इतमीनान बख़श नहीं हैं तो हमें दूसरों से पहले ख़ुद को बदलने की ज़रूरत है। आज हमारे शोअरा भी अपनी शायरी उर्दू रस्म-उल-ख़त के बजाय रोमन या किसी और ज़बान में लिख कर मोबाइल में देखकर मुशायरा पढ़ते हैं।

    राज बहादुर गौड़ की ज़िंदगी हमें ये भी सिखाती है कि ज़बान सिर्फ़ अलफ़ाज़ का मजमूआ नहीं बल्कि समाजी हम-आहंगी का ज़रीया भी है। आज जब मुआशरे में मुख़्तलिफ़ बुनियादों पर तक़सीम पैदा करने की कोशिशें होती हैं, ऐसे वक़्त में उर्दू मुहब्बत, मुकालमा, रवादारी और बाहमी एहतिराम की ज़बान बन कर सामने है। यही वो पैग़ाम है, जिसे राज बहादुर गौड़ ने अपनी अमली ज़िंदगी से साबित किया

    आज एआई, डिजीटल ताअलीम और आलमी राबतों का दौर है। अगर उर्दू को इस दौर के तक़ाज़ों से हम-आहंग ना किया गया तो नई नसल इससे मज़ीद दूर हो सकती है। इसलिए ज़रूरी है कि उर्दू में मयारी डीजीटल मवाद तैयार किए जाएं, ऑनलाइन कोर्सज़ शुरू किए जाएं, ई बुक्स, आडियो बुक्स और तहक़ीक़ी मवाद आसानी से दस्तयाब हों, और नौजवानों को ये एहसास दिलाया जाए कि उर्दू सिर्फ़ माज़ी की यादगार नहीं बल्कि मुस्तक़बिल की भी एक तवाना ज़बान बन सकती है।

दिलों को जोड़ने वाली ज़बान है उर्दू

    उर्दू महज एक ज़बान नहीं बल्कि बर्र-ए-सग़ीर की मुशतर्का तहज़ीब, मुहब्बत, रवादारी और गंगा जमुनी सक़ाफ़्त की ख़ूबसूरत अलामत है। ये वो ज़बान है जो मज़हब, ज़ात, इलाक़े और तबक़े की दीवारों से बुलंद होकर दिलों को जोड़ती है। उर्दू की सबसे बड़ी ख़ूबी ये है कि इसने हमेशा इलाक़ाई ज़बानों के अलफ़ाज़, मुहावरों और लहजों को अपने दामन में समोया है, इसीलिए हर खित्ते के लोग इसमें अपनी मिट्टी की ख़ुशबू महसूस करते हैं। आज भी भारत की बेशतर ज़बानों का अदब, मौसीक़ी, सहाफ़त और रोज़मर्रा गुफ़्तगु किसी ना किसी दर्जे में उर्दू के अलफ़ाज़ से माला-माल है। बल्कि यूं कहा जाये तो ग़लत ना होगा कि तमाम इलाक़ाई ज़बानें उर्दू ही के सहारे फल फूल रही हैं। उर्दू को बजा तौर पर भारत की बेटी, मुहब्बत की ज़बान और क़ौमी यकजहती का मज़बूत वसीला कहा जाता है, इसकी बुनियाद नफ़रत नहीं बल्कि उखुवत, एहतिराम, शाइस्तगी और इन्सान दोस्ती पर क़ायम है। उर्दू की तरक़्क़ी दरअसल भारत की मुशतर्का तहज़ीबी विरासत, लिसानी तनव्वो और बाहमी हम-आहंगी की तरक़्क़ी है

    डाक्टर राज बहादुर गौड़ की यौम पैदाइश पर उन्हें ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने का बेहतरीन तरीक़ा यही है कि हम उनके मिशन को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ। हर घर में उर्दू की एक किताब ज़रूर हो, हर बच्चा उर्दू रस्म-उल-ख़त से वाक़िफ़ हो, हर तालीमी इदारा अपनी मादरी ज़बानों के एहतिराम को फ़रोग़ दे और हर उर्दू दां अपनी ज़बान के लिए वक़्त, सलाहीयत और वसाइल में से कुछ ना कुछ ज़रूर वक़्फ़ करे।

    डाक्टर राज बहादुर गौड़ इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनका पैग़ाम आज भी ज़िंदा है। सवाल सिर्फ ये है कि क्या हम उनके ख़ाब को हक़ीक़त में बदलने के लिए तैयार हैं, या हर साल उनकी यौम पैदाइश पर सिर्फ तारीफ़ी मज़ामीन लिख कर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी समझते रहेंगे? अगर हम वाक़ई उनसे मुहब्बत करते हैं तो हमें याद रखना होगा कि शख़्सियात को ख़राज-ए-अक़ीदत फूल चढ़ाने से नहीं बल्कि उनके मिशन को आगे बढ़ाने से पेश किया जाता है। यही डाक्टर राज बहादुर गौड़ के लिए सबसे बड़ी ख़राज-ए-अक़ीदत होगी, और यही उर्दू, क़ौमी यकजहती और भारत की मुशतर्का तहज़ीबी विरासत की हक़ीक़ी ख़िदमत भी होगी।


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