तालीम याफ़ता नौजवान ही मज़बूत भारत की ज़मान, इनके मुस्तक़बिल से खिलवाड़ क्यों ?

 सफर उल मुजफ्फर, 1448 हिजरी

   फरमाने रसूल        

एक सांस में पानी ना पियो जैसे ऊंट पिता है बल्कि दो और तीन मर्तबा में पियो और जब पियो तो बिस्मिल्लाह कहो और जब बर्तन को मुंह से हटाओ तो अल्लाह की हम्द करो।

(तिर्मीज़ी)


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✅ एमडब्ल्यू अंसारी : भोपाल 

    दुनिया की तारीख़ इस हक़ीक़त की गवाह है कि जिन क़ौमों ने इल्म को अपनी ताक़त बनाया, वो तरक़्क़ी, इज़्ज़त और क़ियादत के मुक़ाम पर पहुंचीं, और जिन्होंने तालीम को नज़रअंदाज किया, वो पसमांदगी, मोहताजी और महरूमी का शिकार हुईं। किसी भी मुल्क की असल दौलत उसके क़ुदरती वसाइल नहीं बल्कि उसके तालीम याफ़ता, बा सलाहीयत और बा शऊर शहरी होते हैं। इसीलिए हर मुहज़्ज़ब मुआशरा अपनी दरसगाहों, जमिआत, लाइब्रेरीयों और तहक़ीक़ी इदारों को अपनी सबसे क़ीमती क़ौमी अमानत समझता है।

    आज हमारे सामने ये सवाल पहले से ज़्यादा अहम हो चुका है कि क्या एक मज़बूत और तरक़्क़ी याफताह भारत का ख़ाब उस वक़्त पूरा हो सकता है, जब तालीम गाहें मुसलसल मुश्किलात, तनाज़आत और ग़ैर यक़ीनी सूरत-ए-हाल का शिकार हों? गुजिश्ता दिनों में मुख़्तलिफ़ तालीमी इदारों के हवाले से पैदा होने वाले तनाज़आत और कार्यवाईयों ने इस बेहस को मज़ीद गहिरा कर दिया है। 

    मौलाना मुहम्मद अली जोहर यूनीवर्सिटी हो, यूनीवर्सिटी आफ़ साईंस एंड टेक्नोलोजी मेघालय हो, अल फ़लाह यूनीवर्सिटी फरीदाबाद हो या गुलू कल यूनीवर्सिटी सहारनपूर हो। ये और इनके अलावा कई इदारों को टार्गेट किया गया है। हर मुआमले की अपनी क़ानूनी और इंतिज़ामी नौईयत हो सकती है, लेकिन हर चीज़ के कुछ उसूल और क़वानीन होते हैं जिनके तहत मुनासिब कार्रवाई की जानी चाहिए। अगर कहीं कोई बे ज़ाबितगी हो तो क़ानून अपनी कार्रवाई करे, मगर तालीम और तलबा के मुस्तक़बिल को हमेशा अव्वलीन तर्जीह दी जानी चाहिए। 

    मौजूदा दौर में हुकूमत की अव्वलीन तर्जीह ये होनी चाहिए कि मुल्कभर में नई यूनीवर्सिटीयां, कॉलेज और तहक़ीक़ी इदारे क़ायम किए जाएं, तलबा को मयारी तालीम, स्कालरशिपस और जदीद सहूलयात फ़राहम की जाएं ताकि भारत इलमी, साईंसी और मआशी मैदान में मज़ीद मज़बूत हो। मगर इसके बरअक्स हुकूमत के ज़रीया बनी बनाई यूनीवर्सिटीयां, कालेजेज ज़मींदोज़ की जा रही है। बाअज़ मवाक़े पर तालीमी इदारों के ख़िलाफ़ ऐसी कार्यवाहीयां देखने में आती हैं जिनसे हज़ारों तलबा का मुस्तक़बिल मुतास्सिर होने का ख़दशा पैदा हो जाता है। अगर कोई यूनीवर्सिटी तबाह या बंद होती है तो ये सिर्फ एक इदारे का नुक़्सान नहीं बल्कि पूरे भारत के तालीमी वक़ार पर एक बदनुमा दाग़ होता है।

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    ये भी अफ़सोसनाक हक़ीक़त है कि मदारिस के बारे में भी मुख़्तलिफ़ किस्म की ग़लत-फ़हमियाँ और मनफ़ी तसव्वुरात पैदा किए जा रहे हैं, हालाँकि मुल्क के तक़रीबन 5 फ़ीसद ग़रीब और नादार बच्चे इन्ही मदारिस में तालीम हासिल करते हैं। ये इदारे ऐसे बच्चों को तालीम का मौक़ा फ़राहम करते हैं, जो माली मजबूरीयों के बाइस मयारी तालीम से महरूम रह जाते। चंद मुआमलात की बुनियाद पर पूरे निज़ाम-ए-मदारिस को शक की निगाह से देखना ना इन्साफ़ के तक़ाज़ों के मुताबिक़ है और ना ही क़ौमी मुफ़ाद में।

    तालीम का नुक़्सान सिर्फ एक इदारे का नुक़्सान नहीं होता बल्कि पूरी क़ौम का नुक़्सान होता है। एक यूनीवर्सिटी बंद होती है तो सिर्फ इमारतें नहीं गिराई जाती बल्कि हज़ारों ख़ाब, सैंकड़ों असातिज़ा की मेहनत और आने वाली नसलों की उम्मीदें भी मुतास्सिर होती हैं। किसी भी मुल्क की तरक़्क़ी का रास्ता अदालतों, जेलों और तनाज़आत से ज़्यादा स्कूलों, कॉलिजों, जमिआत वग़ैरा से ही हमवार होता है। 

    हर मज़हब ने इलम को मुक़ाम और फ़ौक़ियत दी है इसी तरह मज़हब इस्लाम में इलम को ग़ैरमामूली मुक़ाम अता किया गया है। क़ुरआन-ए-करीम की पहली आयत ही ''इकरा' यानी ''पढ़' से शुरू होती है। आख़िरी पैग़ंबर मुहम्मद 000 ने इलम हासिल करना हर मुस्लमान मर्द-ओ-औरत पर फ़र्ज़ क़रार दिया है। इस्लामी तहज़ीब की अज़मत की बुनियाद भी सबसे ज़्यादा क़लम, तहक़ीक़, फ़लसफ़ा, तिब्ब, रियाज़ी, फ़लकियात और तालीम पर क़ायम हुई। यही वजह है कि मुस्लमानों ने बग़दाद, क़ुर्तुबा, क़ाहिरा और दिल्ली जैसे मराकज़-ए-इलम से पूरी दुनिया को रोशनी दी। 

    ये भी हक़ीक़त है कि जहालत हर दौर में इस्तिहसाल करने वालों का सबसे बड़ा हथियार रही है। बाशऊर इन्सान सवाल करता है, दलील मांगता है, आईन को समझता है, अपने हुक़ूक़ और फ़राइज़ से वाक़िफ़ होता है और नफ़रत-ओ-ताअस्सुब का आसान शिकार नहीं बनता। इसके बरअक्स जहालत इन्सान को अफ़्वाहों, फ़िर्कावारीयत, नफ़रत और अंधी तक़लीद की तरफ़ ले जाती है। इसीलिए इलम से डरने वाले हमेशा चाहते हैं कि अवाम कम से कम पढ़ें, कम सोचें और कम सवाल करें, जबकि एक जमहूरी और मज़बूत मुआशरे की बुनियाद आज़ाद फ़िक्र, मयारी तालीम पर क़ायम होती है।

    भारत जैसा अज़ीम और मुतनव्वे मुल्क उस वक़्त हक़ीक़ी तरक़्क़ी कर सकता है, जब यहां हर बच्चा, ख़ाह वो किसी भी मज़हब, ज़ात, ज़बान या मआशी तबक़े से ताल्लुक़ रखता हो, बेहतरीन और आला तालीम हासिल कर सके। हुकूमत, समाजी तन्ज़ीमों, तालीमी इदारों, वालदैन और अहल-ए-ख़ैर सबकी मुशतर्का ज़िम्मेदारी है कि तालीम को सियासत, नफ़रत और तास्सुब से बालातर रखते हुए क़ौमी तर्जीह बनाया जाये। नई यूनीवर्सिटीयां क़ायम हों, पुराने इदारे मज़बूत हों, तालीम को फ़रोग़ मिले, असातिज़ा को इज़्ज़त मिले और तलबा को ख़ौफ़ के बजाय एतिमाद का माहौल फ़राहम हो। 

    इस सिलसिले में ये सवाल भी संजीदगी से उठाया जाना चाहिए कि अगर हुकूमत हक़-ए-तालीम (आरटीई) के तहत बच्चों को इबतिदाई और आठवीं जमात तक तालीम की ज़िम्मेदारी क़बूल कर सकती है तो इस दायरे को मज़ीद वुसअत देते हुए कम अज़ कम बारहवीं जमात बल्कि ग्रैजूएशन तक तालीम को भी मरहला वार सरकारी ज़िम्मेदारी बनाया जाना चाहिए। मौजूदा दौर में सिर्फ इबतिदाई तालीम रोज़गार, ख़ुद कफ़ालत और बावक़ार ज़िंदगी के लिए काफ़ी नहीं रही। आला तालीम हर बच्चे का हक़ीक़ी सरमाया है और यही मुल्क की इन्सानी सलाहीयत को मज़बूत बनाती है। 

    मध्य प्रदेश के साबिक़ वज़ीर-ए-आला दिग्विजय सिंह ने भी हाल ही में इस बात पर-ज़ोर दिया है कि हुकूमत को बच्चों की तालीम की ज़िम्मेदारी बारहवीं जमात ही नहीं बल्कि ग्रैजूएशन तक उठाने पर संजीदगी से ग़ौर करना चाहिए। दरहक़ीक़त तालीम पर होने वाला ख़र्च कोई बोझ नहीं बल्कि मुल्क के मुस्तक़बिल, मईशत और समाजी इस्तिहकाम में सबसे बेहतरीन सरमाया कारी है।

    हमें ये समझना होगा कि किसी भी क़ौम की सबसे बड़ी ताक़त उसके हथियार नहीं बल्कि उसके तालीम-ए-याफ़ता लोग होते हैं। मज़बूत मईशत, जदीद साईंस, बेहतर सेहत, इन्साफ़, समाजी हम-आहंगी और क़ौमी सलामती, सबकी बुनियाद इलम पर ही होती है। अगर वाक़ई हम एक तरक़्क़ी याफताह, बावक़ार और ख़ुद कफ़ील भारत चाहते हैं तो हमें हर हाल में तालीम के चराग़ रौशन रखने होंगे।

    आज वक़्त का तक़ाज़ा यही है कि हम नफ़रत के बजाय किताब को, तास्सुब के बजाय तहक़ीक़ को, शोर के बजाय शऊर को और तक़सीम के बजाय तालीम को फ़रोग़ दें। क्योंकि कौमें तालीम से ही तरक़्क़ी पाती हैं और मुस्तक़बिल उन्हीं का होता है जो क़लम की ताक़त को पहचानते हैं।

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