सफर उल मुजफ्फर, 1448 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जो शख्स कर्ज़ लेते वक्त वापस करने की नियत ना रखें, वह कयामत के दिन चोरों में शुमार होगा।
(मसंद अहमद)
✅ बख्तावर अदब : भोपाल
हर साल 15 जुलाई को दुनियाभर में वर्ल्ड यूथ स्किल डे यानी नौजवानों की हुनरमंदी का आलमी दिन मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मक़सद नौजवानों को इस हक़ीक़त की तरफ़ मुतवज्जा करना है कि बदलती दुनिया में सिर्फ रस्मी तालीम काफ़ी नहीं बल्कि ऐसे अमली, फ़न्नी और डिजीटल हुनर भी ज़रूरी हैं, जो उन्हें बाइज़्ज़त रोज़गार, ख़ुद इन्हिसारी और बेहतर मुस्तक़बिल की ज़मानत फ़राहम कर सकें।
आज दुनिया मस्नूई ज़हानत (एआई), डिजीटल टेक्नोलोजी और तेज़ी से बदलती मईशत के दौर से गुज़र रही है। ऐसे में वो नौजवान, जो वक़्त के तक़ाज़ों के मुताबिक़ अपनी सलाहीयतों में इज़ाफ़ा नहीं करते, रफ़्ता-रफ़्ता रोज़गार की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। अफ़सोस ये है कि हमारे मुआशरे में आज भी तालीम का मतलब सिर्फ डिग्री हासिल कर लेना समझा जाता है, जबकि हक़ीक़त ये है कि डिग्री के साथ हुनर, तजुर्बा, तख़लीक़ी सलाहीयत और मुसलसल सीखने का जज़बा भी उतना ही ज़रूरी है।
मुल्क में हर साल लाखों नौजवान कॉलिजों और यूनीवर्सिटीयों से फ़ारिग़ होते हैं , मगर उनमें से बड़ी तादाद मुनासिब रोज़गार हासिल नहीं कर पाती। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि ताअलीम और रोज़गार की ज़रूरीयात के दरमयान वाजेह फ़र्क़ मौजूद है। सनअत, तिजारत और ख़िदमात के मुख़्तलिफ़ शोबों को जिन महारतों की ज़रूरत है, वो अक्सर हमारे तालीमी निज़ाम में मतलूबा अंदाज़ में शामिल नहीं होतीं। नतीजतन डिग्री हाथ में होती है, लेकिन अमली महारत की कमी नौजवानों को बेरोज़गारी और मायूसी की तरफ़ धकेल देती है।
ये मसला सिर्फ शहरों तक महिदूद नहीं बल्कि देही इलाक़ों में इसकी शिद्दत कहीं ज़्यादा है। वहां के नौजवान अक्सर मयारी तालीमी इदारों, जदीद टैक्नोलोजी, इंटरनैट, कैरीयर काऊंसलिंग और हुनरमंदी के मराकज़ से महरूम रहते हैं। मआशी कमज़ोरी, वसाइल की कमी और मालूमात तक महिदूद रसाई उनके ख़ाबों की राह में रुकावट बन जाती है। ऐसे हालात में मुआशरे के पसमांदा और कमज़ोर तबक़ात के नौजवान सबसे ज़्यादा मुतास्सिर होते हैं।
इस हफ्ते
24 जुलाई,
- कमर दरे अक़रब
- विसाल : हजरत अमीर अबु उलाई, आगरा
25 जुलाई,
- कमर दरे अक़रब
26 जुलाई,
- कमर दरे अक़रब
- विसाल : हजरत सलमान फारसी, रदि अल्लाहो ताअला अन्हो
- विसाल : बाबा तनवीर अशरफ अलैहिर्रमा, किछौछा शरीफ
27 जुलाई,
- विसाल : हजरत उवैस करनी, रदि अल्लाहो ताअला अन्हो
- विसाल : हजरत अल्लाहमा फज्ले हक खैराबादी
28 जुलाई,
- विसाल : हजरत इमाम निसाई, रहमत उल्ला अलैह
30 जुलाई,
- उर्स : सैय्यद अहमद शम्से आलम, कुतुबे रायपुर, रहमत उल्ला अलैह
- उर्स : हजरत लाल मोहम्मद, अलैहिर्रमा, उड़ीसा
आज के दौर में कम्पयूटर, एआई, ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग, डीजीटल मार्केटिंग, वैब डिवैलपमैंट, मोबाइल एप्लीकेशन, इलेक्टरेशन, प्लंबिंग, मशीन ऑप्रेशन, ज़बानों की महारत, ज़राइआ इबलाग़ में महारत, कारोबारी मंसूबा बंदी और छोटे कारोबार की ट्रेनिंग जैसे शोबे नौजवानों के लिए नए मवाक़े पैदा कर रहे हैं। अगर नौजवान अपनी दिलचस्पी और सलाहीयत के मुताबिक़ इन मैदानों में महारत हासिल करें तो वो ना सिर्फ अपने लिए बल्कि दूसरों के लिए भी रोज़गार के मवाक़े पैदा कर सकते हैं।
ये भी एक हक़ीक़त है कि मुआशरे में अब भी बाअज़ वालदैन सिर्फ़ डाक्टर, इंजीनियर या सरकारी मुलाज़मत को ही कामयाबी का मयार समझते हैं, जबकि दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है। आज एक हुनर-मंद नौजवान, चाहे वो किसी भी शोबे से वाबस्ता हो, अपनी क़ाबिलीयत की बुनियाद पर इज़्ज़त, मआशी इस्तिहकाम और आलमी सतह पर शिनाख़्त हासिल कर सकता है। इसलिए सोच में तबदीली वक़्त की अहम ज़रूरत है।
हुकूमतों की भी ज़िम्मेदारी है कि वो नौजवानों के लिए जदीद और मयारी स्किल डेवलपमंट मराकज़ क़ायम करें, फ़न्नी तालीम को फ़रोग़ दें, सनअतों के साथ तालीमी इदारों का राबिता मज़बूत करें और ऐसे प्रोग्राम तर्तीब दें जिनसे ट्रेनिंग के बाद रोज़गार या ख़ुद रोज़गार के मवाक़े पैदा हों। इसी तरह तालीमी इदारों को भी निसाबी तालीम के साथ अमली तर्बीयत, इंटर्नशिप, डीजीटल महारत और शख़्सियत साज़ी पर ख़ुसूसी तवज्जा देनी चाहिए।
इसके साथ साथ समाजी और फ़लाही तन्ज़ीमों का किरदार भी निहायत अहम है। अगर ये इदारे ग़रीब, यतीम, पसमांदा और माली तौर पर कमज़ोर नौजवानों को तालीम के साथ हुनरमंदी की ट्रेनिंग, कैरीयर काऊंसलिंग, स्कालरशिप और रोज़गार से जोड़ने की कोशिश करें तो हज़ारों ख़ानदानों की तक़दीर बदल सकती है। असल ख़िदमत यही है कि नौजवानों को इस काबिल बनाया जाए कि वो दूसरों का मुहताज ना रहे बल्कि ख़ुद दूसरों का सहारा बन सकें।
हमें ये भी समझने की ज़रूरत है कि नौजवानों में मायूसी, नशीली चीज़ों की लानत, सोशल मीडीया का ग़ैर ज़रूरी इस्तिमाल, नफ़रतअंगेज़ सोच और बे-मक़्सद मसरुफ़ियात उसी वक़्त कम होंगी, जब उन्हें मुसबत सिम्त, बेहतर तालीम, मयारी हुनर और बाइज़्ज़त रोज़गार मयस्सर आएगा। एक मसरूफ़, बासलाहीयत और हुनरमंद नौजवान ना सिर्फ अपने ख़ानदान बल्कि पूरे मुआशरे के लिए सरमाया साबित होता है।
वर्ल्ड यूथ स्किल डे हमें ये पैग़ाम देता है कि अगर हम एक मज़बूत, ख़ुशहाल और तरक़्क़ी याफताह मुआशरा चाहते हैं तो हमें अपने नौजवानों को सिर्फ अस्नाद नहीं बल्कि सलाहीयत, एतिमाद, किरदार और हुनर भी देना होगा। यही वो सरमाया है, जो किसी भी क़ौम को तरक़्क़ी की नई मंज़िलों तक पहुंचा सकता है।
ये हक़ीक़त है कि वो ही कोमैं तरक़्क़ी करती हैं, जो अपने नौजवानों को महज डिग्री नहीं बल्कि इल्म, हुनर, किरदार और मवाक़े फ़राहम करती हैं। अगर हम नौजवान नसल को तालीम के साथ जदीद महारतों से आरास्ता करें तो वो अपने मुस्तक़बिल के साथ साथ मुल्क-ओ-मुआशरे का मुस्तक़बिल भी रोशन कर सकते हैं।
आईपीएस (रिटा. डीजीपी, छत्तीसगढ़)

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