कमाल मौला मस्जिद मामला : उठता जा रहा है सैकूलरिज्म के तईं भरोसा : एमडब्ल्यू अंसारी

 जिल हज्ज, 1447 हिजरी 

फरमाने रसूल ﷺ

क्या मैं तुम्हें ये ना बता दूँ के जहन्नुम किस पर हराम है? फिर फरमाया जहन्नुम उस शख्स पर हराम है, जो लोगों के साथ नरमी और सहूलियत के मामला इख्तियार करें।

- तिर्मिज़ी 


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✅ बख्तावर अदब : भोपाल

     मध्य प्रदेश के तारीख़ी शहर धार में वाके कमाल मौला मस्जिद, जिसे आज ''भोज शाला तनाजा'' के नाम से पेश किया जा रहा है, महज एक इमारत या इबादत-गाह का मसला नहीं, बल्कि भारत में तारीख़ी विरसे, आईनी मुसावात और मज़हबी आज़ादी के मुस्तक़बिल से जुड़ा एक निहायत हस्सास मुआमला था, है और रहेगा। हालिया अदालती फ़ैसले के बाद ये मसला एक बार फिर क़ौमी बेहस का मौज़ू है और मुल्क के करोड़ों अमन पसंद इंसानों में तशवीश और ग़म का माहौल है।

    इस्लामी तालीमात और फ़िक़ही उसूलों के मुताबिक़ जब कोई जगह एक मर्तबा मस्जिद के तौर पर वक़्फ़ कर दी जाती है तो वो महज एक इमारत या ज़मीन  का टुकड़ा नहीं रहती बल्कि ''वक़्फ़-ए-इलाही' बन जाती है। शरीयत की रो से ऐसी ज़मी हमेशा के लिए अल्लाह के नाम से मख़सूस हो जाती है, जिसे न फ़रोख़त किया जा सकता है, न मुंतकिल किया जा सकता है और न ही उसकी मज़हबी हैसियत तबदील की जा सकती है। इसलिए ये कहना कि मुसलमान उस जगह को छोड़कर कहीं और मस्जिद तामीर कर लें, मुसलमानों के जज़बात के साथ खिलवाड़ करना और शरई हुक्म की ख़िलाफ़वरज़ी भी है। सदियों तक जहां अज़ान गूंजती रही हो, नमाज़ अदा होती रही हो और जिसे उम्मत-ए-मुस्लिमा ने मस्जिद की हैसियत से क़बूल किया हो, उसकी शिनाख्त महज निजामी और सियासी फ़ैसलों से ख़त्म नहीं की जा सकती। यही वजह है कि मुस्लिम कमाल मौला मस्जिद के मसले को सिर्फ एक तारीख़ी तनाजा के तौर पर नहीं बल्कि अपने दीनी विरसे, मज़हबी हक़ और वक़्फ़ की शरई हैसियत से जुड़ा मुआमला समझते हैं।

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    कमाल मौला मस्जिद की तारीख़ सदियों पर मुहीत है। तारीख़ी रवायात और मुख़्तलिफ़ हवालों के मुताबिक़ ये मस्जिद सल्तनत-ए-दिल्ली के दौर में मालवा की फ़तह के बाद तामीर की गई और बाद के दौर में इसकी मरम्मत और तौसीअ भी होती रही। मस्जिद की माअमीर और फन्ने ताअमीर, मेहराब, दालान, सहन, हौज़ और दीगर आसार को देखते हुए ये बात वाज़िह है कि ये एक मुनज्जम इस्लामी इबादत-गाह है। सदियों तक यहां नमाज़ अदा होती रही और ये इलाके के दीनी व समाजी मर्कज के तौर पर पहचानी जाती रही है। 

    बाद के ज़माने में बाअज़ हलक़ों की जानिब से ये दावा किया गया कि ये मुक़ाम दरअसल क़दीम 'सरस्वती मंदिर' या 'संसकृत पाठशाला ' थी, जिसे बाद में मस्जिद में तबदील कर दिया गया। लेकिन इस दावे के हक़ में ऐसा कोई तारीख़ी सबूत सामने नहीं आ सका जिसकी बुनियाद पर सदियों से क़ायम मज़हबी शिनाख्त को मुकम्मल तौर पर तबदील कर दिया जाए। कई मोअर्रखीन ने भी इस दावे को बहुत ही साफ़ लफ़्ज़ों में कमज़ोर और कयासआराई पर मबनी क़रार दिया है। यही वजह है कि तवील अर्से तक इस मुक़ाम को एक मुतनाजा मगर मुशतर्का इंतज़ामी निज़ाम के तहत चलाया जाता रहा, जहां मुसलमानों को जुमा की नमाज़ की इजाज़त हासिल थी।

    लेकिन हालिया अदालती फ़ैसले से ये तवाजुन बदल गया है। अदालती फैसले ने न सिर्फ़ नमाज़ की इजाज़त ख़त्म कर दी बल्कि इस मुक़ाम को बाज़ाबता तौर पर मंदिर क़रार देते हुए हिदू इबादत के लिए खोल दिया जो कि आईन की रूह के ख़िलाफ़ है। ये फ़ैसला मुस्लिम हलक़ों में इस एहसास को मज़ीद गहरा कर रहा है कि मुल्क में तारीख़ी मसाजिद की मज़हबी हैसियत को मुसलसल चैलेंज किया जा रहा है। बाबरी मस्जिद के बाद इस नौईयत के फ़ैसलों ने एक बड़े तबक़े के ज़हन में ये सवाल पैदा कर दिया है कि अगर किसी मुक़ाम पर सदियों तक नमाज अदा होती रही हो, इस्लामी आसार मौजूद हों, और उसे तारीख़ी इस्लामी विरसे के तौर पर तस्लीम किया जाता रहा हो, तो फिर उसकी शिनाख्त को किस बिना पर तबदील किया जा है।

    अफ़सोस की बात ये है कि आज बाअज़ मीडीया, चैनल्स और अखबारात इस मुआमले में यकतरफ़ा और ग़ैर मुसद्दिक़ा और ग़ैर मुंसिफाना मालूमात पेश कर रहे हैं। हालाकि तारीख़ी हवालों, क़दीम दस्तावेज़ात और सदियों तक वहां नमाज़ की अदायगी जैसे वाजेह शवाहिद इस मुक़ाम के मस्जिद होने की गवाही देते हैं, इसके बावजूद कुछ हलक़े मख़सूस बयानात क़ायम करने के लिए बेबुनियाद दावों और जज़बाती प्रोपेगैंडा का सहारा ले रहे हैं। ज़िम्मेदार सहाफ़त का तक़ाज़ा ये है कि ऐसे हस्सास मुआमलात में हक़ायक़, तारीख़ और ग़ैर जानिबदारी को तर्जीह दी जाए। 

    तारीख़ में इससे पहले भी कई ऐसे वाक़ियात पेश आ चुके हैं जहां ''आस्था''और अक्सरीयती दावों को बेबुनियाद बताकर तारीख़ी मसाजिद की हैसियत को चैलेंज किया गया है। बाबरी मस्जिद, अयोध्या इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जिसे सदियों तक मस्जिद माने जाने के बावजूद एक तवील तनाजा के बाद मुनहदिम कर दिया गया। इन मुआमलों ने मुसलमानों में ये तशवीश पैदा कर दी है कि अगर तारीख़ी शवाहिद, मज़हबी आज़ादी और आईनी तहफ़्फुज़ात के बजाय सिर्फ अक़ीदत और अक्सरीयती एहसासात को बुनियाद बनाया जाता रहा तो अक़ल्लीयतों को कभी इंसाफ़ नहीं मिलेगा। 

    यहां असल मसला महज एक मुक़द्दमा नहीं बल्कि इंसाफ के उसूल का है। भारत का आईन तमाम मज़ाहिब के मानने वालों को बराबर हुक़ूक़ देता है। अगर तारीख़ी तनाजात को सिर्फ अक्सरीयती जज़बात (आस्था) की बिना पर हल किया जाने लगे तो फिर मुल्क की सैकूलर रूह कमज़ोर पड़ सकती है। अदालतों से हमेशा ये तवक़्क़ो की जाती है कि वो तारीख़, शवाहिद और आईनी इक़दार की रविष में ऐसे फ़ैसले दें, जो मुल्क में एतिमाद, हम आहंगी और इंसाफ को मंजबूत करे। 

    ये हक़ीक़त भी नजर अंदाज नहीं की जा सकती कि भारत की तहज़ीब मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब, सक़ाफ़्तों और तारीख़ी रवायात के इश्तिराक से बनी है। मसाजिद, मंदिर, गिरजा-घरों और दीगर तारीख़ी मुक़ामात को महिज़ तनाजा की अलामत की बजाए मुशतर्का विरसे के तौर पर देखा जाना चाहिए। अगर हर तारीख़ी मुक़ाम को नए सिरे से मज़हबी ऐनक और आस्था के झूटे प्रोपेगैंडा की नजर से देखा जाएगा तो इससे मुआशरे में बे एतिमादी और कशीदगी बढ़ेगी।

    मुस्लिम फ़रीक़ ने इस फ़ैसले को सुप्रीमकोर्ट में चैलेंज करने का ऐलान किया है लेकिन तब तक वहां पूजापाट नहीं होना चाहिए। उम्मीद की जा रही है कि आला अदालत इस मुआमले का जायज़ा तारीख़ी हक़ायक़, आईनी उसूलों और मज़हबी आज़ादी के तनाजर में लेगी। भारत जैसे कसीर मज़हबी मुल्क में यही रास्ता अमन, इंसाफ और बाहमी एतिमाद को बरक़रार रख सकता है।

    आज ज़रूरत इस बात की है कि इस मसले को इश्तिआल, नफरत और सयासी फ़ायदे के बजाय तारीख़ी दयानतदारी और इंसाफ के साथ देखा जाए। क्योंकि इबादतगाहें महज पत्थरों की इमारतें नहीं होतीं, वो क़ौमों की याददाश्त, अक़ीदत और तहज़ीबी शिनाख्त का हिस्सा भी होती हैं। 

- आईपीएस (रिटा. डीजी, छत्तीसगढ़)
ये लेखक के अपने विचार हैं।

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