जनजातीय अस्मिता का संरक्षण और धर्मांतरण की चुनौतियाँ : एक विश्लेषण

bakhtawar adab, hamza travel tales

✅ मोहम्मद शमीम खान : रायपुर

    16 फरवरी, 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने डिजीटल तांडी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य मामले में एक महत्वपूर्ण याचिका खारिज करते हुए ग्राम सभाओं द्वारा मिशनरियों के प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंधों को उचित ठहराया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने माना कि आदिवासी गांवों द्वारा लगाए गए ये प्रतिबंध उनकी संस्कृति और सामाजिक अखंडता को बचाने के लिए एक निवारक उपाय हैं। 
    यह निर्णय न केवल कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उन दशकों पुराने संघर्षों को भी मान्यता देता है, जिनके खिलाफ भगवान बिरसा मुंडा और कार्तिक उरांव जैसे महान आदिवासी नेताओं ने आवाज उठाई थी। बिरसा मुंडा ने अपने समय में मिशनरियों द्वारा आदिवासियों की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करने के प्रयासों की तीखी आलोचना की थी और अपनी सत्य और प्राकृतिक परंपराओं की ओर लौटने का आह्वान किया था। इसी तरह, पूर्व सांसद कार्तिक उरांव ने भी स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि धर्मांतरण आदिवासियों को उनकी मूल पहचान से काट देता है, जिससे वे अपनी विशिष्टता खो देते हैं।
    न्यायिक परिप्रेक्ष्य में, रेव. स्टेनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1977) के ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म प्रचार के अधिकार में किसी दूसरे को धर्मांतरित करने का मौलिक अधिकार शामिल नहीं है। हाल के वर्षों में विभिन्न उच्च न्यायालयों ने भी यह चिंता जताई है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को धर्मांतरण के सुनियोजित हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। धर्मांतरण के कारण आदिवासियों के बीच गैर-जनजातीयकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जहां वे अपनी सदियों पुरानी पूजा पद्धतियों और सामुदायिक उत्सवों को छोड़कर विदेशी धार्मिक मानकों को अपना लेते हैं। इससे गांवों के भीतर सामाजिक विभाजन, संघर्ष और परिवारों के टूटने की स्थिति पैदा होती है, जो अंततः जनजातीय समाज की सामूहिकता को नष्ट कर देती है।
    पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 ग्राम सभाओं को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा करने का संवैधानिक अधिकार देता है। न्यायालय का रुख यह स्पष्ट करता है कि किसी भी प्रकार के प्रलोभन, धोखे या सेवाओं की आड़ में किया जाने वाला धर्मांतरण एक सामाजिक खतरा है जिसे रोकने के लिए स्थानीय समुदायों के पास कानूनी अधिकार हैं। 
    यह लेख इस बात पर बल देता है कि जनजातीय विरासत का संरक्षण किसी भी धार्मिक विस्तारवादी एजेंडे से ऊपर है और इसे बचाए रखना भारत की सांस्कृतिक विविधता के लिए अनिवार्य है।

ये लेखक के अपने विचार हैं। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ