रमज़ान और ग़रीबों के हुक़ूक़ ज़कात, सदक़ात और मौजूदा दौर में इजतिमाई ज़िम्मेदारियाँ

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रमजान उल मुबारक, 1447 हिजरी 

फरमाने रसूल ﷺ

"तुम अपने लिए भलाई के अलावा कोई और दुआ ना करो क्योंकि जो तुम कहते हो उस पर फरिश्ते आमीन कहते है।"

- मुस्लिम 

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मसला ये नहीं कि उम्मत में दौलत कम है, 
मसला ये है कि दौलत की तक़सीम ग़ैर मुंसिफ़ाना है
ज़कात और सदक़ात महिज़ सवाब कमाने का ज़रीया नहीं 
बल्कि समाजी ज़िम्मेदारी हैं
अगर हमारा रमज़ान सिर्फ अपने घर के दस्तर-ख़्वान तक महिदूद रहा 
तो हमने इस महीने का पैग़ाम नहीं समझा

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✅ बख्तावर अदब : भोपाल 

    रमज़ान उल-मुबारक महज इन्फ़िरादी इबादत का महीना नहीं बल्कि ये समाजी इन्साफ़ का अमली निज़ाम भी पेश करता है। ये, वो महीना है, जो हमें याद दिलाता है कि इबादत सिर्फ़ सज्दों तक महिदूद नहीं, बल्कि बंदों के हुक़ूक़ अदा किए बग़ैर अल्लाह की रज़ा मुकम्मल नहीं हो सकती। खासतौर पर ग़रीब, मुहताज, यतीम, बेवा, मज़दूर और बेसहारों की मदद। यही वो लोग हैं, जो हमारी तवज्जा के सबसे ज़्यादा हक़दार हैं।
    ज़कात इस्लाम का महिज़ एक माली फ़रीज़ा नहीं बल्कि एक मआशी इन्क़िलाब है । ये दौलत को चंद हाथों में जमा होने से रोकती है और मुआशरे में गर्दिश देती है। अगर ज़कात सही तरीक़े के साथ अदा की जाए तो कोई ख़ानदान भूख से नहीं तड़पेगा, कोई बच्चा तालीम से महरूम नहीं रहेगा और कोई मरीज़ ईलाज के बग़ैर नहीं मरेगा। मसला ये नहीं कि उम्मत में दौलत कम है, मसला ये है कि दौलत की तक़सीम ग़ैर मुंसिफ़ाना है।
    आज के दौर में महंगाई, बेरोज़गारी, क़र्ज़ और मआशी दबाव ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। रोज़ कमाने और रोज़ खाने वाले तबक़े के लिए रमज़ान बाज़-औक़ात मज़ीद मुश्किल हो जाता है। ऐसे हालात में ज़कात और सदक़ात महिज़ सवाब कमाने का ज़रीया नहीं बल्कि समाजी ज़िम्मेदारी हैं। ये सोच बदलने की ज़रूरत है कि हम रमज़ान में चंद तस्वीरें खिंचवा कर या दिखावे की ख़ैरात करके अपना फ़र्ज़ अदा कर देते हैं। असल रूह ये है कि मदद इज़्ज़त-ए-नफ़स के साथ की जाए, ख़ामोशी से की जाये, और इस तरह की जाये कि किसी की ज़िंदगी सँवर जाये
    इस्लाम ने सिर्फ मांगने वालों को देने का हुक्म नहीं दिया बल्कि तलाश करके मुस्तहक़्क़ीन तक पहुंचने की तालीम दी। हमारे इर्दगिर्द कितने सफेदपोश ख़ानदान हैं जो किसी के सामने हाथ नहीं फैलाते मगर शदीद मुश्किलात का शिकार हैं। ज़कात का सही मुसर्रिफ़ ये है कि ऐसे लोगों को मआशी सहारा दिया जाए, उन्हें रोज़गार के काबिल बनाया जाए, तालीम और ईलाज की सहूलत दी जाए। यानी उन्हें वक़्ती नहीं बल्कि मुस्तक़िल सहारा दिया जाए।
    रमज़ान हमें इजतिमाई सोच सिखाता है। अगर हर मुहल्ला, हर मस्जिद, हर तंज़ीम एक मुनज़्ज़म तरीक़े से ज़कात और सदक़ात का निज़ाम बनाए तो मुआशरे में हक़ीक़ी तबदीली आ सकती है। यतीम बच्चों की कफ़ालत, बेवाओं के लिए वज़ीफ़ा, हुनर सिखाने के मराकज़, तालीमी स्कालरशिप, ये सब ज़कात की रूह के ऐन मुताबिक़ काम हैं।
    याद रखिये, ग़रीबों का हक़ अदा करना एहसान नहीं बल्कि फ़र्ज़ है। क़ुरआन ने वाज़िह किया कि माल में साइल और महरूम का हिस्सा मुक़र्रर है। इसलिए रमज़ान हमें नर्म-दिल बनाने के साथ साथ मुंसिफ़ाना मुआशरा बनाने की दावत देता है।

    अगर हमारा रमज़ान सिर्फ अपने घर के दस्तर-ख़्वान तक महिदूद रहा तो हमने इस महीने का पैग़ाम नहीं समझा। असल रमज़ान वो है जिसमें हमारे पड़ोस का चूल्हा भी जलता हो, किसी की बेटी की शादी आसान हो जाए, किसी मरीज़ का ईलाज हो जाए, और किसी बच्चे का मुस्तक़बिल महफ़ूज़ हो जाए। यही रमज़ान की असल बरकत है जो बंदे को बंदों के क़रीब कर दे।

पेशकश : 
बेनज़ीर अंसार एजूकेशनल एंड सोशल वेल्फेयर सोसाइटी 
(उसेआ रिसोर्ट)
क्वींस होम, अहमदाबाद पैलेस 
भोपाल

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