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जीअकादा, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
अल्लाह ताअला ने मेरी उम्मत के दिलों में पैदा होने वाले वसवसों को माफ कर दिया है, जब तक वो उस पर अमल न करे या ज़बान पर ना लाए।
- सहीह बुख़ारी
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तारीख़ के सफ़हात में बाअज़ शख़्सियात ऐसी होती हैं, जो अपनी इन्फ़िरादी हैसियत से बढ़कर एक पूरे अह्द, एक नज़रिए और एक तहज़ीबी शऊर की नुमाइंदा बन जाती हैं। राजा जय किशन इन्ही दरख़शां शख़्सियात में शामिल हैं, जिन्होंने ना सिर्फ अलीगढ़ तहरीक की तामीर में नुमायां किरदार अदा किया बल्कि हिंदू-मुस्लिम यकजहती, मुशतर्का तहज़ीब और इल्मी बेदारी की ऐसी मिसाल क़ायम की, जो आज भी हमारे लिए मशाल-ए-राह है।
ये बातें 30 अप्रैल को उनकी यौमे वफात के मौके पर मुकर्ररीन ने कही। उन्होंने कहा, राजा जय किशन का किरदार इस हक़ीक़त की याद दिलाता है कि क़ौमों की तरक़्क़ी किसी एक तबक़े या मज़हब की मरहून-ए-मिन्नत नहीं बल्कि मुख़्तलिफ़ तबक़ात की मुशतर्का कोशिशों का नतीजा होती है।
राजा जय किशन का शुमार सर सय्यद अहमद ख़ां के क़रीबी रफ़क़ा में होता है। वे एक मुअज़्ज़िज़ ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे, मगर उनकी सोच मज़हबी तअस्सुबात से बुलंद और वसीअ उल-नज़री पर मबनी थी। उन्होंने सर सय्यद के साथ जदीद तालीम के फ़रोग़, समाजी इस्लाह और फ़िक्री बेदारी के मिशन में अमली हिस्सा लिया। सर सय्यद से उनका ताल्लुक़ महज ज़ाती क़ुरबत का नहीं, बल्कि एक मुशतर्का तालीमी और फ़िक्री मक़सद का था। यही वो बुनियाद थी, जिसने अलीगढ़ तहरीक को एक क़ौमी और तहज़ीबी तहरीक बनाया।
राजा जय किशन की शख़्सियत इस हक़ीक़त का अमली सबूत है कि उर्दू ज़बान की ख़िदमत सिर्फ मुस्लमानों ने नहीं की बल्कि ग़ैर मुस्लिम अहल-ए-इल्म ने भी इसकी आबयारी में अहम किरदार अदा किया। उर्दू, जो मुशतर्का तहज़ीब और बाहमी राबते की ज़बान रही है, इसकी तरक़्क़ी में कई ग़ैर मुस्लिम दानिशवरों, अदीबों और मुस्लिहीन ने नुमायां ख़िदमात अंजाम दी हैं। राजा जय किशन ने उर्दू को इल्मी इज़हार का वसीला बनाया और इसके फ़रोग़ के लिए निहायत संजीदा किरदार अदा किया।
वे ना सिर्फ तालीमी और अदबी तहरीकों के मुआविन थे बल्कि अलीगढ़ में तालीमी इदारों के क़ियाम और इस्तिहकाम में भी उनकी फ़िक्री ख़िदमात शामिल थीं। सर सय्यद के तालीमी मिशन को मज़बूत बुनियाद फ़राहम करने में उनका किरदार नुमायां रहा। अलीगढ़ के इल्मी हलक़ों में उन्हें क़दर-ओ-मंजिलत की निगाह से देखा जाता था, और उनकी वफ़ात पर अहल-ए-इल्म ने गहरे रंज-ओ-ग़म का इज़हार किया था। ये इस बात की अलामत है कि वे सिर्फ एक फ़र्द नहीं बल्कि एक तालीमी-ओ-तहज़ीबी तहरीक के फ़आल सतून थे।
राजा जय किशन की ज़िंदगी हमें ये सबक़ देती है कि भारत की तालीमी और समाजी बेदारी की तहरीकें हमेशा मुशतर्का जद्द-ओ-जहद से परवान चढ़ी हैं। आज जब समाज में मज़हबी तक़सीम, नफ़रत और तंगनज़री को हवा दी जा रही है, ऐसे में राजा जय किशन जैसी शख़्सियात हमें ये याद दिलाती हैं कि भारत की असल ताक़त उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब और मुशतर्का सक़ाफ़्ती विरसे में मुज़म्मिर है। उनकी ज़िंदगी इस बात की रोशन दलील है कि क़ौमों की तामीर मुहब्बत, तआवुन और इजतिमाई कोशिशों से होती है, ना कि नफ़रत और तफ़रीक़ से।
अफ़सोस ये कि आज अलीग बिरादरी ख़ुद अपने इन मुहसिनों को फ़रामोश किए जा रही है। सर सय्यद अहमद ख़ां की यौम पैदाइश और यौम वफ़ात पर तक़ारीब तो मुनाक़िद होती हैं, मगर उनके इन रफ़क़ा को याद नहीं किया जाता जिन्होंने इस तहरीक को कामयाबी से हमकिनार करने में कलीदी किरदार अदा किया, ख़ुसूसन वो ग़ैर मुस्लिम शख़्सियात जिन्होंने बग़ैर किसी ताअस्सुब के इस मिशन को अपनी ख़िदमत से जिला बख़शी।
आज ज़रूरत इस बात की है कि सर सय्यद अहमद ख़ां के तमाम मुस्लिम-ओ-ग़ैर मुस्लिम रफ़क़ा को तारीख़ में उनका जायज़ मुक़ाम दिया जाए। सिर्फ 17 अक्तूबर को यौम सर सय्यद मना लेना ही काफ़ी नहीं, बल्कि सर सय्यद के तालीमी मिशन और इसमें शरीक तमाम मुआवनीन की ख़िदमात को उजागर करना वक़्त का तक़ाज़ा है। अगर अलीग बिरादरी वाक़ई सर सय्यद के विरसे की अमीन है तो उसे इन तमाम शख़्सियात को याद करना होगा जिन्होंने इस तहरीक को मुशतर्का क़ौमी विरसा बनाया।
राजा जय किशन को याद करना दरअसल अपने इजतिमाई शऊर, मुशतर्का तहज़ीब, रवादारी और तालीमी विरसे को याद करना है। उनका यौम वफ़ात हमें ये सबक़ देता है कि तारीख़ सिर्फ़ बड़े नामों को याद रखने का नाम नहीं बल्कि उन ख़ामोश मुअम्मारों को भी ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने का तक़ाज़ा करती है जिन्होंने क़ौम की फ़िक्री और तालीमी बुनियादों को मज़बूत किया।
आज जब हम राजा जय किशन के यौम वफ़ात पर उन्हें सलाम करते हैं तो हमें ये अह्द भी करना चाहिए कि हम सर सय्यद के इस मुशतर्का तालीमी मिशन को ज़िंदा रखेंगे, और उन तमाम मुस्लिम-ओ-ग़ैर मुस्लिम शख़्सियात की ख़िदमात को याद रखेंगे जिन्होंने इल्म, इत्तिहाद और तहज़ीब के इस चिराग़ को रोशन रखा।
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