रमजान उल मुबारक, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जिस शख्स का मकसद आखेरात की बेहतरी हो, अल्लाह ताअला उसके दिल को गनी कर देता है, उसके बिखरे हुए कामों को समेट देता है और दुनिया ज़लील हो कर उसके पास आती हैं।
- तिर्मीज़ी शरीफ
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27 मार्च यौमे वफात पर खास
सर सय्यद को न सिर्फ याद किया जाए बल्कि उनकी फ़िक्र को भी ज़िंदा रखा जाए
ज़रूरत इस बात की है कि जिस तरह यौम पैदाइश पर अलीग बिरादरी एक प्लेटफार्म पर जमा होती है, उसी तरह यौम वफ़ात के मौके पर भी इजतिमाई तौर पर उनके लिए ईसाल-ए-सवाब किया किया जाए और इससे बढ़कर उनके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए एक अमली और मूसिर लायहा अमल तैयार किया जाए। मौजूदा हालात इस बात के मुतक़ाज़ी हैं कि सर सय्यद को न सिर्फ याद ना किया जाए बल्कि उनकी फ़िक्र को भी ज़िंदा रखा जाए।
किसी भी मुल्क की तरक़्क़ी तभी मुम्किन हो सकती है, जब उसके तमाम तबक़ात को यकसाँ मवाक़े फ़राहम किए जाएं। इसके बरअक्स जब किसी मख़सूस तबक़े को मुसलसल नज़रअंदाज किया जाता है तो वो समाजी, तालीमी और इक़तिसादी मैदान में पीछे रह जाता है। जैसा कि मुस्लिम और दीगर पसमांदा तबकात के साथ गुजिश्ता कुछ सालों से मुतवातिर किया जा रहा है।
मुस्लमानों की पसमांदगी का सबसे बड़ा सबब तालीमी अदम मुसावात है। ये कहना कि मुस्लमान ताअलीम हासिल नहीं करना चाहते, हक़ीक़त के बरअक्स है। असल मसला ये है कि मयारी तालीमी इदारों की कमी, सरकारी स्कूलों की अबतर हालत और मआशी दुशवारीयों के बाइस उनके लिए ताअलीम के मवाक़े महदूद हो गए हैं। रोज़गार के मैदान में भी उन्हें ख़ातिर-ख़्वाह मवाक़े मयस्सर नहीं, जिसकी वजह से माली इस्तिहकाम एक ख़ाब बन कर रह गया है। कारोबारी दुनिया में सरमाया और सहूलयात की कमी भी एक बड़ी रुकावट है।
सियासी मैदान में कमज़ोर नुमाइंदगी ने भी उनके मसाइल को मज़ीद पेचीदा बना दिया है। पालिसी साज़ी में मुनासिब हिस्सादारी ना होने के बाइस उनके मसाइल अक्सर नज़रअंदाज कर दिए जाते हैं। इसके साथ ही मीडीया के एक तबक़े की जानिब से मुस्लमानों की मनफ़ी तस्वीरकशी ने भी मुआशरे में ग़लत-फ़हमियाँ और तअस्सुबात को जन्म दिया है, जिसका बराह-ए-रास्त असर उनके हुक़ूक़ और मवाक़े पर पड़ रहा है।
अगर हम तारीख़ के दरीचों से झांकें तो मालूम होगा कि सर सय्यद अहमद ख़ान ने किस तरह अपनी पूरी ज़िंदगी क़ौम की तालीमी और समाजी इस्लाह के लिए वक़्फ़ कर दी। अलीगढ़ तहरीक दरअसल एक ज़हनी इन्क़िलाब था, जिसने मुस्लमानों को जदीद तालीम की तरफ़ राग़िब किया और उन्हें नए दौर के तक़ाज़ों से हम-आहंग किया। वो एक ऐसा विजन रखते थे जिसमें इलम, तहक़ीक़ और विसात-ए-नज़र बुनियादी सतून थे।
मगर अफ़सोस कि हमने सर सय्यद को महज तक़रीबात और नारों तक महिदूद कर दिया है। इसके बरअक्स होना ये चाहिये कि हमने सर सय्यद के मिशन के साथ कितना इन्साफ़ किया है और आइन्दा क्या करना चाहिए। साथ ही ये फिक्र भी करनी चाहिए कि उनके तालीमी मिशन को कैसे आगे बढ़ाया जाए।
आज जब दुनिया तेज़ी से बदल रही है, नए मसाइल जन्म ले रहे हैं, आलमी सतह पर ईरान जैसे खित्तों में कशीदगी, मुल्क के अंदर बाअज़ फिल्मों और बयानियों के ज़रीये मख़सूस तबक़ों को निशाना बनाने की कोशिशें, और अदलिया-ओ-दीगर इदारों के हवाले से उठते सवालात एक संजीदा फ़िक्र के मुतक़ाज़ी हैं। ऐसे माहौल में सर सय्यद की एतिदाल पसंद, इलमी और हक़ीक़त पसंदाना सोच की एहमीयत और भी बढ़ जाती है।
मज़ीद ये कि ज़बान-ओ-सक़ाफ़्त के मैदान में भी चैलेंजिज़ कम नहीं हैं। उर्दू, अरबी और फ़ारसी जैसी ज़बानों के फ़रोग़ के लिए क़ायम इदारे माली बोहरान का शिकार हैं, असातिज़ा की तक़र्रीयां ना के बराबर हैं और कई इदारे बंद होने के दहाने पर हैं बल्कि बंद हो चुके हैं। ये सूरत-ए-हाल ना सिर्फ तहज़ीबी नुक़्सान का बाइस है बल्कि तालीमी पसमांदगी को भी बढ़ा रही है।
ऐसे हालात में अलीग बिरादरी की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। सर सय्यद की तालीमी तहरीक को आगे बढ़ाना, नए तालीमी इदारे क़ायम करना, नौजवानों को जदीद उलूम और हुनर से आरास्ता करना वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है। हमें सिर्फ हुकूमतों से शिकवा करने के बजाए ख़ुद अपनी ज़िम्मेदारीयों का एहसास करना होगा।
सर सय्यद की ज़िंदगी का ख़ुलासा यही था कि क़ौम को तालीमयाफ़ता, ख़ुद कफ़ील और बावक़ार बनाया जाए। हर सूबे में अलीगढ़ तर्ज़ के तालीमी इदारे क़ायम करने की जद्द-ओ-जहद की जाए, ताकि इलम का चिराग़ हर घर तक पहुंच सके।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि सर सय्यद अहमद ख़ान को ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करने का सबसे मूसिर तरीक़ा यही है कि हम उनके मिशन को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं। तालीम को आम करें, शऊर को बेदार करें और एक ऐसे मुआशरे की तशकील करें जो इलम-ए-इंसाफ़ और मुसावात पर क़ायम रहकर सर सय्यद के अफ़्क़ार, मिशन और तहरीक को आगे बढ़ाया जाए बल्कि पूरी क़ुव्वत-ओ-ताक़त के साथ वो काम किया जाए जिससे क़ौम का खोया हुआ वक़ार हासिल हो। यही सर सय्यद के ख़ाब की ताबीर है और यही हमारे रोशन मुस्तक़बिल की ज़मानत भी।
- बे नजीर अंसार एजूकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसायटी

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