रमज़ान, क़ुरआन का महीना, तकाज़ा ये है कि क़ुरआन-ए-करीम को अमली ज़िंदगी में लाने की मेहनत की जाए

रमजान उल मुबारक, 1447 हिजरी 

फरमाने रसूल ﷺ

जिस शख्स का मकसद आखेरात की बेहतरी हो, अल्लाह ताअला उसके दिल को गनी कर देता है, उसके बिखरे हुए कामों को समेट देता है और दुनिया ज़लील हो कर उसके पास आती हैं।

तिर्मीज़ी शरीफ

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hamza travel tales

✅ बख्तावर अदब : भोपाल 

    रमज़ान उल-मुबारक को क़ुरआन का महीना भी कहा जाता है, क्योंकि इसी महीने में क़ुरआन नाज़िल हुआ। रमज़ान आते ही मसाजिद में और घरों में भी लोग क़ुरआन की तिलावत का ज़्यादा एहतिमाम करते हैं, तरावीह में पूरा क़ुरआन सुनने का शौक़ बढ़ जाता है। ये सब यक़ीनन बाइस-ए-सआदत है। मगर एक बुनियादी सवाल ये है कि क्या कुरआन से हमारा ताल्लुक़ सिर्फ तिलावत तक महिदूद है या हमें उसे अपनी अमली ज़िंदगी में भी लाना चाहिए। 
    क़ुरआन महज सवाब के लिए पढ़ने की किताब नहीं, बल्कि ज़िंदगी गुज़ारने का मुकम्मल ज़ाबता हयात है। ये किताब इन्सान के अक़ीदे को दुरुस्त करती है, अख़लाक़ को सँवारती है, मुआशरत को मुनज़्ज़म करती है और अदल-ओ-इन्साफ़ का निज़ाम क़ायम करने की रहनुमाई देती है। अगर क़ुरआन सिर्फ रमज़ान में खोला जाए और बाक़ी साल अलमारी में बंद रहे तो यक़ीनन हम उसके असल मक़सद से दूर रह जाते हैं।
    क़ुरआन-ए-करीम की ख़ूब तिलावत की जाए। मोतमिद उल्मा से तर्जुमा और तफ़सीर पढ़ी जाए उसे समझा जाए। उल्मा से रब्त मज़बूत हो, दर्स-ए-क़ुरआन की महफ़िलों में शिरकत हो, और घरों में बाक़ायदा मोतमिद आलम दीन की निगरानी में मुताला क़ुरआन का माहौल बनाया जाए।
    कुरआन हमें सबसे पहले अख़लाक़ की इस्लाह सिखाता है। सच्च बोलना, वाअदा पूरा करना, अमानतदारी, अदल, सब्र, अफ़व-ओ-दरगुज़र, ये कुरआनी तालीमात हैं। अगर हम क़ुरआन पढ़ कर भी कारोबार में धोका दें, ज़बान से बदकलामी करें या ना इंसाफ़ी करें तो ये क़ुरआन के पैग़ाम से दूरी की अलामत है। क़ुरआन का असल तक़ाज़ा ये है कि इसकी तालीम हमारे रवैये से झलके। 
    मौजूदा दौर में जब मुआशरा तेज़ रफ़्तारी और अख़लाक़ी इंतिशार का शिकार है, क़ुरआन एक मुतवाज़िन ज़िंदगी का रास्ता दिखाता है। ये इन्सान को याद दिलाता है कि असल कामयाबी सिर्फ़ दुनियावी तरक़्क़ी में नहीं बल्कि आख़िरत की जवाबदेही में भी है। कुरआन हमें एहतिसाब-ए-नफ़स की दावत देता है, और यही एहतिसाब एक बेहतर मुआशरा की तशकील है।
    क़ुरआन का एक अहम पहलू समाजी इन्साफ़ भी है। ये कमज़ोरों के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त करता है, यतीमों और मिस्कीनों का ख़्याल रखने का हुक्म देता है, सूद, ज़ुलम और इस्तिहसाल से रोकता है। अगर हम क़ुरआन को अमली ज़िंदगी में लाएंगे तो मआशी बेएतिदाली और समाजी ना इंसाफ़ी ख़ुद बख़ुद कम हो सकती है। क़ुरआन सर्फ़-ए-इबादत का नहीं बल्कि एक मुंसिफ़ाना मुआशरे का मंशूर है।
    नौजवान नसल के लिए खासतौर पर ज़रूरी है कि वो क़ुरआन को महिज़ रिवायती अंदाज़ में ना देखे बल्कि उसे फ़िक्री हनुमाई के तौर पर समझे। जदीद चैलेंजिज़, सोशल मीडीया के फ़ित्नों और नज़रियाती इंतिशार के इस दौर में क़ुरआन एक मज़बूत बुनियाद फ़राहम करता है। अगर नौजवान क़ुरआन से जुड़ जाएं तो वो मुसबत सोच, मज़बूत किरदार और वाज़िह मक़सद के हामिल बन सकते हैं।
    रमज़ान हमें क़ुरआन से दुबारा ताल्लुक़ जोड़ने का बेहतरीन मौक़ा फ़राहम करता है। मगर असल कामयाबी ये है कि ये ताल्लुक़ रमज़ान के बाद भी बरक़रार रहे। रोज़ाना चंद आयात समझ कर पढ़ना, उन पर ग़ौर करना और अपनी ज़िंदगी में उनको लाने की कोशिश करना ही क़ुरआन से सच्ची वाबस्तगी है। क़ुरआन का महीना हमें याद दिलाता है कि ये किताब क़ियामत तक के लिए हिदायत है, शर्त ये है कि हम उसे अपनी ज़िंदगी का आईना और रहनुमा बना लें। 


                                                                                              पेशकश : 
बेनज़ीर अंसार एजूकेशनल एंड सोशल वेल्फेयर सोसाइटी
 (उसेआ रेसोर्ट) 
क्वींस होम, अहमदाबाद पैलेस 
भोपाल

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