रमजान उल मुबारक, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जो चीज़ सबसे ज़्यादा लोगों को जन्नत में दाखिल करेगी, वो है ख़ौफ-ए-खुदा और हुस्न-ए-अखलाक।
- तिर्मिज़ी
✅ बख्तावर अदब : भोपाल
रमज़ान हमें सब्र, हमदर्दी और दूसरों का दर्द महसूस करना सिखाता है। मुआशरे में कुछ ऐसे लोग भी अक्सर आपको देखने को मिल जाएंगे जो ख़ुद तकलीफ़ में होकर भी दूसरों के लिए आसानियां पैदा करते हैं लेकिन हम अक्सर उन्हें नज़रअंदाज कर जाते हैं। ये वो तबक़ा है, जो हमारे शहरों को साफ़ रखता है, मरीज़ों का ईलाज करता है, सामान घरों तक पहुँचाता है और सख़्त धूप में मज़दूरी कर ज़िंदगी का पहिया चलाता है।
सोचिए, जब हम रोज़े की हालत में घर या दफ़्तर में आराम कर रहे होते हैं, उसी वक़्त कोई सफ़ाई मुलाज़िम गलियों में कचरा उठा रहा होता है, डिलीवरी ब्वॉय तेज़ गर्मी में पार्सल पहुंचा रहा होता है, डाक्टर या नर्स हस्पताल में मरीज़ों की जान बचाने में मसरूफ़ होता है, और कोई मज़दूर रोज़ी कमाने के लिए ईंटें उठा रहा होता है। उनमें से बहुत से लोग ख़ुद भी रोज़े से होते हैं, इसके बावजूद वे मेहनत-मशक्कत कर रहे होते हैं।
रमज़ान हमें सिर्फ अपनी इबादत का नहीं बल्कि ऐसे लोगों के एहतिराम का भी दरस देता है। उनकी मेहनत को मामूली समझना ना इंसाफ़ी है। ये मुआशरे की रीढ़ की हड्डी हैं। अगर एक दिन के लिए सफ़ाई का निज़ाम रुक जाए, अगर हस्पतालों में अमला ना हो, अगर ट्रांसपोर्ट और तरसील का निज़ाम बंद हो जाए तो ज़िंदगी का निज़ाम दरहम-बरहम हो जाए।
हमें अपनी सोच बदलनी होगी। ख़िदमत करने वालों से सख़्त लहजा इख़तियार करना, मामूली बात पर डाँट देना या उन्हें कमतर समझना, रोज़े की रूह के ख़िलाफ़ है। रोज़ा इन्सान को नर्म-दिल और शुक्रगुज़ार बनाता है। एक मुस्कुराहट, एक शुक्रिया, एक गिलास ठंडा पानी या इफ़तार के वक़्त एक खजूर देना भी बड़ी नेकी हो सकती है।
रमज़ान के बहाने अल्लाह हमें एक बेहतरीन मौक़ा अता करता है कि हम ऐसे लोगों की अमली क़दर अफ़्ज़ाई करें। महलों में सफ़ाई मुलाज़मीन के लिए इफ़तार का इंतिज़ाम, हस्पतालों में तिब्बी अमले के लिए दुआ और तआवुन, मज़दूरों के लिए सह्र-ओ-इफ़तार के पैकेट, डिलीवरी करने वालों के साथ इज़्ज़त का बरताव, ये सब वो छोटे अमल हैं, जो बड़े असरात रखते हैं।
इस्लाम ने मेहनत करने वाले के पसीने को इज़्ज़त दी है। नबी करीमﷺ ने मज़दूर की उजरत उसका पसीना ख़ुशक होने से पहले अदा करने की तालीम दी है। इस तालीम में सिर्फ माली हक़ नहीं बल्कि एहतिराम का जज़बा भी शामिल है।
अगर हमारा रोज़ा हमें दूसरों की ख़िदमत करने वालों का क़द्र-दान नहीं बनाता तो हमने रमज़ान के पैग़ाम का एक अहम हिस्सा खो दिया। असल इबादत वो है, जो इन्सान को इन्सान के क़रीब ले आए, दिलों में नरमी पैदा करे और मुआशरे में इज़्ज़त-ओ-एहतिराम की फ़िज़ा क़ायम करे।
रमज़ान हमें यही सिखाने आता है कि अल्लाह के नज़दीक बड़ा वो नहीं, जो ओहदे या दौलत में बड़ा हो, बल्कि वो है, जिसका दिल बड़ा हो।
पेशकश :
बेनज़ीर अंसार एजूकेशनल एंड सोशल वेल्फेयर सोसाइटी
(उसेआ रेसोर्ट), क्वींस होम
अहमदाबाद पैलेस
भोपाल


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