✅ बख्तावर अदब : भोपाल
रमज़ान उल-मुबारक अल्लाह ताला की रहमतों, बरकतों और मग़फ़िरत का महीना है। ये वो मुबारक महीना है, जिसमें इन्सान को सब्र, शुक्र, ईसार और एतिदाल की अमली तर्बीयत दी जाती है। रोज़ा सिर्फ़ भूख और प्यास बर्दाश्त करने का नाम नहीं, बल्कि ये इन्सान के अंदर ज़ब्त-ए-नफ़स, हमदर्दी और ख़िदमत-ए-ख़लक़ का जज़बा पैदा करता है। मगर अफ़सोस कि वक़्त के साथ-साथ रमज़ान के बाअज़ आमाल-ओ-मामूलात में हमने ऐसी तब्दीलियां कर दी हैं, जो इस मुक़द्दस महीने की असल रूह को मुतास्सिर करना शुरू कर दिया है। इनमें सबसे नुमायां मसला इफ़तार पार्टियों का बढ़ता रुजहान है, जो अब कई जगहों पर सादगी और इबादत के बजाय नमूद-ओ-नुमाइश और समाजी-ओ-सियासी तशहीर का ज़रीया बनता जा रहा है।इस्लाम में इफ़तार का तसव्वुर निहायत सादा और बाबरकत है। रसूल-ए-अकरमﷺ ने रोज़ा खोलने के लिए खजूर या पानी को काफ़ी क़रार दिया और सादगी को पसंद फ़रमाया है। अहादीस में इस बात की बड़ी फ़ज़ीलत बयान हुई है कि जो शख़्स किसी रोज़ादार को इफ़तार कराएगा उसे रोज़ादार के बराबर अज्र मिलता है। मगर इस तालीम का मक़सद कभी भी ये नहीं था कि इफ़तार को तकल्लुफ़ात, मुकाबला शान-ओ-शौकत और दौलत की नुमाइश का ज़रीया बना दिया जाए। आज सूरत-ए-हाल ये है कि बड़े शहरों में महंगे शादी हाल, होटलों, फ़ार्म हाउस और शानदार मुक़ामात पर होने वाली इफ़तार पार्टियां फ़ैशन शक्ल इख़तियार कर चुकी हैं। दर्जनों किस्म के खाने, सजावट के ख़ुसूसी इंतिज़ामात और सोशल मीडीया पर उनकी तशहीर अब एक आम मंज़र बन चुकी है।
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रमजान उल मुबारक, 1447 हिजरी
﷽
फरमाने रसूल ﷺ
जो चीज़ सबसे ज़्यादा लोगों को जन्नत में दाखिल करेगी, वो है ख़ौफ-ए-खुदा और हुस्न-ए-अखलाक।
- तिर्मिज़ी
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ये रुजहान इसलिए भी तशवीशनाक है कि रमज़ान दरअसल हमें भूख का एहसास दिला कर मुआशरे के कमज़ोर और महरूम तबक़ात के क़रीब लाने के लिए आता है। रोज़ा हमें ये सबक़ देता है कि हम उनकी तकलीफ़ को समझें जो साल के बारह महीने भूख और महरूमी का सामना करते हैं। लेकिन जब इफ़तार के दस्तर-ख़्वान सिर्फ अमीरों और बा-असर लोगों के लिए मख़सूस हो जाएं और उन पर लाखों रुपय ख़र्च होने लगें तो सवाल पैदा होता है कि क्या ये तर्ज़-ए-अमल रमज़ान के पैग़ाम के मुताबिक़ है।
कुरान-ए-मजीद में वाजेह तौर पर इसराफ़ और फुज़ूलखर्ची से मना किया गया है। अल्लाह ताअला ने फ़रमाया ''फुज़ूलखर्ची करने वाले शैतान के भाई हैं।' रमज़ान तो वैसे भी ज़ब्त-ए-नफ़स और एतिदाल की तर्बीयत का महीना है, ऐसे में इफ़तार के नाम पर बेजा अख़राजात इस महीने की रूह के बिलकुल ख़िलाफ़ हैं। अगर इन्ही तक़रीबात पर ख़र्च होने वाली रक़म का कुछ हिस्सा भी ज़रूरतमंदों तक पहुंच जाए तो बेशुमार ग़रीब ख़ानदानों के चूल्हे जल सकते हैं और कई बच्चों के चेहरे ख़ुशी से रोशन हो सकते हैं।
एक और पहलू जो काबिल-ए-तवज्जा है, वो ये कि बाअज़ इफ़तार तक़रीबात अपनी असल रूह से हट कर महज समाजी मेल-जोल, फ़ैशन और दिखावे का मंज़र बन जाती हैं। बाअज़ जगहों पर इन इजतिमाआत में वो संजीदगी, वक़ार और रूहानियत नज़र नहीं आती जो रमज़ान के माहौल का तक़ाज़ा है। हालाँकि ये महीना इन्सान को हया, सादगी और बातिनी इस्लाह का दरस देता है। अगर इफ़तार के इजतिमाआत में यही इक़दार मफ़क़ूद हो जाएं तो ये हमारे लिए लम्हा फ़िक्रिया होना चाहिए।
सियासी मैदान में भी इफ़तार पार्टियों का एक ख़ास किरदार नज़र आता है। रमज़ान के दौरान मुख़्तलिफ़ सियासी शख़्सियात और जमातें बड़ी-बड़ी इफ़तार पार्टियों का एहतिमाम करती हैं जिनमें अक्सर असल मक़सद ख़िदमत या इबादत के बजाय सियासी रवाबित मज़बूत करना या अवामी हमदर्दी हासिल करना होता है। इस तरह मज़हबी जज़बे को कभी-कभी सियासी मुफ़ादात के लिए भी इस्तिमाल किया जाता है, जो यक़ीनन रमज़ान की रूह के मुनाफ़ी है।
इस सूरत-ए-हाल का मतलब ये नहीं कि इफ़तार के इजतिमाआत मना हैं या लोगों को एक साथ बैठ कर रोज़ा खोलने से रोका जाए। इस्लाम इजतिमाई इफ़तार और बाहमी मुहब्बत को पसंद करता है। असल मसला नीयत, अंदाज़ और तर्ज़-ए-अमल का है। अगर इफ़तार का मक़सद अल्लाह की रज़ा, उखुवत और ख़िदमत-ए-ख़लक़ हो तो ये निहायत बाबरकत अमल है। लेकिन अगर उसका मक़सद सिर्फ लोगों को मुतास्सिर करना या समाजी बरतरी दिखाना हो तो उसकी रूह बाक़ी नहीं रहती।
ज़रूरत इस बात की है कि हम इफ़तार के तसव्वुर को दुबारा उसकी असल रूह के मुताबिक़ ज़िंदा करें। मसाजिद में सादा इजतिमाई इफ़तार का एहतिमाम, महलों में ग़रीब ख़ानदानों तक राशन पहुंचाना, यतीम बच्चों और मज़दूरों के साथ इफ़तार करना, अस्पतालों में मरीज़ों के तीमार-दार के लिए खाने का इंतिज़ाम करना जैसे वो काम हैं जो रमज़ान के पैग़ाम को अमली शक्ल देते हैं। अगर मुआशरा इस सिम्त में क़दम बढ़ाए तो इफ़तार वाक़ई एक मुसबत समाजी तहरीक बन सकती है जो मुहब्बत, मुसावात और हमदर्दी को फ़रोग़ दे।
ज़रूरत इस बात की भी है कि साहिब सर्वत हज़रात रमज़ान के अलावा भी अपनी वुसअत के मुताबिक़ क़ौम की तालीमी और माली पसमांदगी पर नज़र करें। क़ौम में तालीम की शरह कम होती जा रही है, अहम तक़ाज़ा ये है कि क़ौम के बच्चों को आला तालीम दिलवाई जाए, उनकी मुआवनत की जाए।
वक़्त का तक़ाज़ा है कि हम ख़ुद से ये सवाल करें कि हमारी इफ़तार अल्लाह को राज़ी करने के लिए है या सिर्फ लोगों को मुतास्सिर करने के लिए। रमज़ान का असल पैग़ाम हमें यही याद दिलाता है कि इज़्ज़त सादगी में है, बरकत एतिदाल में है और हक़ीक़ी ख़ुशी दूसरों के साथ बांटने में है। जब इफ़तार के दस्तर-ख़्वान पर ग़रीब और अमीर एक साथ बैठेंगे, जब दिखावे के बजाय इख़लास को एहमीयत दी जाएगी, तब ही रमज़ान की हक़ीक़ी रूह हमारे मुआशरे में ज़िंदा हो सकेगी।
कुरान-ए-मजीद में वाजेह तौर पर इसराफ़ और फुज़ूलखर्ची से मना किया गया है। अल्लाह ताअला ने फ़रमाया ''फुज़ूलखर्ची करने वाले शैतान के भाई हैं।' रमज़ान तो वैसे भी ज़ब्त-ए-नफ़स और एतिदाल की तर्बीयत का महीना है, ऐसे में इफ़तार के नाम पर बेजा अख़राजात इस महीने की रूह के बिलकुल ख़िलाफ़ हैं। अगर इन्ही तक़रीबात पर ख़र्च होने वाली रक़म का कुछ हिस्सा भी ज़रूरतमंदों तक पहुंच जाए तो बेशुमार ग़रीब ख़ानदानों के चूल्हे जल सकते हैं और कई बच्चों के चेहरे ख़ुशी से रोशन हो सकते हैं।
एक और पहलू जो काबिल-ए-तवज्जा है, वो ये कि बाअज़ इफ़तार तक़रीबात अपनी असल रूह से हट कर महज समाजी मेल-जोल, फ़ैशन और दिखावे का मंज़र बन जाती हैं। बाअज़ जगहों पर इन इजतिमाआत में वो संजीदगी, वक़ार और रूहानियत नज़र नहीं आती जो रमज़ान के माहौल का तक़ाज़ा है। हालाँकि ये महीना इन्सान को हया, सादगी और बातिनी इस्लाह का दरस देता है। अगर इफ़तार के इजतिमाआत में यही इक़दार मफ़क़ूद हो जाएं तो ये हमारे लिए लम्हा फ़िक्रिया होना चाहिए।
सियासी मैदान में भी इफ़तार पार्टियों का एक ख़ास किरदार नज़र आता है। रमज़ान के दौरान मुख़्तलिफ़ सियासी शख़्सियात और जमातें बड़ी-बड़ी इफ़तार पार्टियों का एहतिमाम करती हैं जिनमें अक्सर असल मक़सद ख़िदमत या इबादत के बजाय सियासी रवाबित मज़बूत करना या अवामी हमदर्दी हासिल करना होता है। इस तरह मज़हबी जज़बे को कभी-कभी सियासी मुफ़ादात के लिए भी इस्तिमाल किया जाता है, जो यक़ीनन रमज़ान की रूह के मुनाफ़ी है।
इस सूरत-ए-हाल का मतलब ये नहीं कि इफ़तार के इजतिमाआत मना हैं या लोगों को एक साथ बैठ कर रोज़ा खोलने से रोका जाए। इस्लाम इजतिमाई इफ़तार और बाहमी मुहब्बत को पसंद करता है। असल मसला नीयत, अंदाज़ और तर्ज़-ए-अमल का है। अगर इफ़तार का मक़सद अल्लाह की रज़ा, उखुवत और ख़िदमत-ए-ख़लक़ हो तो ये निहायत बाबरकत अमल है। लेकिन अगर उसका मक़सद सिर्फ लोगों को मुतास्सिर करना या समाजी बरतरी दिखाना हो तो उसकी रूह बाक़ी नहीं रहती।
ज़रूरत इस बात की है कि हम इफ़तार के तसव्वुर को दुबारा उसकी असल रूह के मुताबिक़ ज़िंदा करें। मसाजिद में सादा इजतिमाई इफ़तार का एहतिमाम, महलों में ग़रीब ख़ानदानों तक राशन पहुंचाना, यतीम बच्चों और मज़दूरों के साथ इफ़तार करना, अस्पतालों में मरीज़ों के तीमार-दार के लिए खाने का इंतिज़ाम करना जैसे वो काम हैं जो रमज़ान के पैग़ाम को अमली शक्ल देते हैं। अगर मुआशरा इस सिम्त में क़दम बढ़ाए तो इफ़तार वाक़ई एक मुसबत समाजी तहरीक बन सकती है जो मुहब्बत, मुसावात और हमदर्दी को फ़रोग़ दे।
ज़रूरत इस बात की भी है कि साहिब सर्वत हज़रात रमज़ान के अलावा भी अपनी वुसअत के मुताबिक़ क़ौम की तालीमी और माली पसमांदगी पर नज़र करें। क़ौम में तालीम की शरह कम होती जा रही है, अहम तक़ाज़ा ये है कि क़ौम के बच्चों को आला तालीम दिलवाई जाए, उनकी मुआवनत की जाए।
वक़्त का तक़ाज़ा है कि हम ख़ुद से ये सवाल करें कि हमारी इफ़तार अल्लाह को राज़ी करने के लिए है या सिर्फ लोगों को मुतास्सिर करने के लिए। रमज़ान का असल पैग़ाम हमें यही याद दिलाता है कि इज़्ज़त सादगी में है, बरकत एतिदाल में है और हक़ीक़ी ख़ुशी दूसरों के साथ बांटने में है। जब इफ़तार के दस्तर-ख़्वान पर ग़रीब और अमीर एक साथ बैठेंगे, जब दिखावे के बजाय इख़लास को एहमीयत दी जाएगी, तब ही रमज़ान की हक़ीक़ी रूह हमारे मुआशरे में ज़िंदा हो सकेगी।
पेशकश :
बेनज़ीर अंसार एजूकेशनल एंड सोशल वेल्फेयर सोसाइटी
(उसेआ रेसोर्ट), क्वींस होम
अहमदाबाद पैलेस रोड
भोपाल

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